श्री देशना
───── ✦ ─────
← सभी लेख

श्री देशना संग्रह

देने का आनंद- सेवा से समृद्धि की ओर

15 जनवरी 2026

───── ✦ ─────


यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रही और व्यापार कई गुना फलता-फूलता गया। एक पुरानी कहावत है- जब आप दूसरों के कल्याण के लिए खर्च करते हैं, तो वही शक्ति कई गुना होकर लौटती है। मेरे जीवन में यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। बीच-बीच में कठिनाइयाँ आईं, पर व्यापार की गति कभी रुकी नहीं, बल्कि हर बार और अधिक तीव्र होती चली गई।

सरकारी नियमों के कारण वर्ष 1984 में हमें चेन्नई से अपना संचालन बैंगलोर स्थानांतरित करना पड़ा। प्रारंभ में लगा कि शायद व्यवसाय बंद ही न करना पड़े, पर हुआ इसके बिल्कुल विपरीत-कारोबार कई गुना बढ़ा और लाभ अप्रत्याशित रूप से ऊपर चढ़ता चला गया। उस समय यह स्पष्ट दिखने लगा कि सेवा में लगाया गया धन कभी नष्ट नहीं होता, वह वापस  लौट आता है।

इसी सफलता ने मुझे उन संस्थानों की खोज के लिए प्रेरित किया जिन को  दान कि आवश्यकता थीं । उन्हीं दिनों शंकर नेत्रालय-डॉ. एस. एस. बद्रीनाथ द्वारा 1978 में स्थापित एक प्रतिष्ठित नेत्र चिकित्सालय-विकास के लिए दाताओं की तलाश में था। एक मित्र के सुझाव पर मैं उनसे मिलने गया। हमने ₹5 लाख दो वर्षों में देने का संकल्प लिया, किंतु व्यापार की तेज़ प्रगति के कारण पूरी राशि केवल छह महीनों में ही अदा कर दी गई। शीघ्र ही मुझे नेत्रालय के बोर्ड में भी सम्मिलित किया गया।

संस्थान की ख्याति के कारण भुगतान (paying patient)करने वाले रोगियों को दो से छह महीने तक अपॉइंटमेंट के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। संस्थान का उद्देश्य यह भी था कि कम से कम 20% रोगियों का उपचार पूर्णतः निःशुल्क किया जाए। परंतु एक व्यावहारिक समस्या सामने आई-गरीब रोगी अस्पताल की भव्यता और वातावरण से भयभीत होकर आने से हिचकिचाते थे। यह विषय बोर्ड की बैठक में उठा, और मैंने जनजागरूकता की जिम्मेदारी स्वयं ली।

मेरे कर्मचारी इस चुनौती के लिए आगे आए। उन्होंने बसों, ट्रेनों और झुग्गी- बस्तियों में पर्चे बाँटे। हर रविवार को “निःशुल्क रोगी दिवस” घोषित किया गया। प्रारंभ में लोगों को संदेह था कि क्या शंकर नेत्रालय सच में मुफ्त इलाज करता है, किंतु हमारे कर्मचारियों के भरोसे और व्यवहार ने लोगों का भय दूर किया। धीरे-धीरे गरीब रोगी आने लगे, उनकी जाँच और उपचार तत्काल होने लगा, और यह अभियान पूरी तरह सफल सिद्ध हुआ।

आज भी शंकरा नेत्रालय अपनी कुल शल्य-क्रियाओं में से 25 प्रतिशत से अधिक निःशुल्क करता है। 

यही उस सेवा-दृष्टि की जीवंत मिसाल है, जो केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि हज़ारों जीवनों की रोशनी में दिखाई देती है।

सच ही कहा गया है- जो देता है, वह कभी खाली नहीं होता; सेवा से भरा हाथ ही समृद्धि का पात्र बनता है। 

और जब दान जीवन की आदत बन जाए, तब सफलता केवल लक्ष्य नहीं रहती- वह समाज के चेहरे पर लौटती हुई मुस्कान बन जाती है। 

 सुगालचंद जैन, चेन्नई


टिप्पणियाँ