श्री देशना
───── ✦ ─────

श्री देशना संग्रह

स्पंदन एक पाठक का

डॉ दंडिभोट्ला नागेश्वर राव,

आलेख22/8/20262 मिनट पढ़ने का समय

आजकल एक ट्रेंड बनी है कि सामाजिक माध्यमों में विशेष कर कुछ हिंदी वेबसाइट एवं फेसबुक में हिंदी में दो-तीन कविता -सी तुकबंदी वाली फ़ूहड़ पंक्तियों को लिखकर (जिसमें अवश्य कोई सनसनी अथवा कुछ अश्लील व्याख्या होगी) उनको "कैंपस कविता" के रूप में परोसा जा रहा है।

सुदूर दक्षिण के गांव से आकर उस्मानिया व हैदराबाद विश्वविद्यालय के

कैंपस में मित्रों के साथ, बहुत बार देर तक गुरुजनों के साथ बैठकर हिंदी कैसे लिखना कैसे पढ़ना, कविता कैसे समझाना इत्यादि विषयों को एक प्रपत्ति भाव से गंभीरता पूर्वक सीखनेवाले और खुद को बेहतर बनाने वाले, हम जैसे लोगों को यह बात बहुत खल रही है। ‌ कैंपस हमारे लिए केवल विश्वविद्यालय का प्रांगण नहीं है। ‌ नयी जानकारी नयी सोच और नये भाषा शब्द एवं नए-नए प्रयोग सीखने के लिए बनी प्रकृति की पाठशाला है। ‌

विचित्र है कि कोई इसका खंडन नहीं कर रहा है जब कि ये पंक्तियां समाज में विषाक्त भाव फैलाने में समर्थ हैं।

जब भी मैं देखता हूं नीचे कमेंट में जाकर प्रार्थना करता हूं ऐसी पंक्तियां मत लिखा करिए-- कम से कम हिंदी कविता के नाम पर, और कम से कम कैंपस के नाम पर मत लिखा करिए।

आज देख कर प्रसन्नता हुई कि आचार्य @Puneet जी ने यह प्रयास किया है, डॉ धर्मवीर भारती जी की याद दिला कर इन सबका खंडन किया है।

काव्य को हमारे पास "शिवेतर क्षतये" कहा गया यानी अमंगलकारी भावनाओं का खंडन करने हेतु काव्य का सृजन होना चाहिए। ऐसी सतही मनोवृति वालों की क्षणिक यश-कांक्षा पूर्ति के लिए नहीं।

उनके इस पुनीत कार्य के लिए मैं आचार्य पुनीत बिसारिया जी का स्वागत करता हूं और मैं उनका पूरा समर्थन करता हूं। मैं उनके साथ हूं यह बताने के लिए कि यह असली हिंदी या 'हिंदवी' नहीं है।

#स्पंदन एक पाठक का

डॉ दंडिभोट्ला नागेश्वर राव,

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय,

तिरुवारूर।

टिप्पणियाँ