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आकाशवाणी की कहानी : गिरिजा कुमार माथुर की ज़बानी

मुकुल शर्मा

आलेख27/8/202617 मिनट पढ़ने का समय

आकाशवाणी की कहानी : गिरिजा कुमार माथुर की ज़बानी

आप लोगों ने यह गीत तो सुना ही होगा : “मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन ....” आदि। हां सच है, सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री गिरिजा कुमार माथुर का यह लोकप्रिय गीत भला किसने न सुना होगा? वह एक लम्बे समय तक पहले आकाशवाणी फिर दूरदर्शन से जुड़े रहे। इन सशक्त जनसंचार माध्यमों को एक दिशा व सोच देने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

उनसे आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रारम्भिक दिनों और कार्यक्रमों की भाषा व रूपरेखा आदि के संबंध में, जनकपुरी वाले उनके घर में, मेरी सन् 1986 में एक साक्षात्कार के दौरान बातचीत हुई थी। उन दिनों उनकी पत्नी बीमार थीं, इसलिए वह मुझे जो समय देना चाहते थे और विस्तार से जो बाते बताना चाहते थे यह ठीक से यानी अपनी इच्छानुसार नहीं कर पा रहे थे। लिहाजा, यह साक्षात्कार पूरा नहीं हुआ और इसीलिए प्रकाशित भी नहीं हो पाया। फिर भी थोड़ा-थोड़ा समय देकर उन्होंने जो कुछ भी बताया वह काफी महत्वपूर्ण है।

इस अधूरे साक्षात्कार को मैं "सचेतक" पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रही हूं - इस भावना के साथ कि आकाशवाणी के इतिहास, यानी पुराने कालखण्ड के जो थोड़े से मोती हाथ लगे हैं वे भी कहीं बिखर न जायें। सोना शर्मा।

हम जिसे आज आकाशवाणी कहते हैं, उसका 1952 से पहले नाम 'ऑल इण्डिया रेडियो' था। रेडियो के 'चरित्र' पर यदि हम विचार करें, तो हम देखते हैं कि 1946–47 तक एक सीमांत आता है जिसे हम सामंती सोच का काल कह सकते हैं। उसके बाद 1948 से 1965 का वह कालखण्ड है, जिसमें उसके पहले के स्वरूप को परिवर्तित कर, रेडियो को भारतीय जनमानस के अनुकूल और भारतीय जनता तक पहुचने का एक गम्भीर माध्यम बनाया गया।

मेरा सम्पर्क रेडियो से 1939 में हुआ था। उस समय मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग का छात्र था। 1939 में लखनऊ रेडियो से जो पहला यूनिवर्सिटी के छात्रों का कार्यक्रम प्रसारित हुआ था, उसे हम लोगों ने ही मिल कर बनाया था और पेश किया था। उस समय रेडियो में बी.पी. निगम थे, जो जनसंचार की पत्रकारिता में प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे हैं। उस कार्यक्रम में मैंने अपनी कविताएं और गीत प्रस्तुत किये थे और मैंने जो गीत चुने थे उनमें बच्चन जी महादेवी जी के गीत थे।

रेडियो - एक फिल्मी कम्पनी की तरह

उस समय रेडियो के संबंध में लोगो की आम धारणा थी कि यह फिल्मी कम्पनियों की तरह की ही कोई कम्पनी है। अधिकाश लोग नहीं जानते थे कि यह सरकारी विभाग है। उसका कारण भी था। रेडियो 1936 से पहले एक निजी कम्पनी के हाथ में था।

सरकारी हाथ में आने के बाद भी लोगों के मन में उसकी छवि उसी कम्पनी की थी। लखनऊ के चारबाग स्टेशन से हजरतगंज जाने वाली सड़क का नाम तब एडवर्ड रोड था। उसी रोड पर ‘पायोनियर’ के दफ्तर के सामने था : “आइडियल फिल्म स्टूडिया”। यह एक बंगला था। देखने में दफ्तर नहीं लगता था।

ऑल इण्डिया रेडियो के बंगले मे लोग जाते नहीं थे, न बुलाये जाते थे। वहां का वातावरण सामंती था और अफसर अंग्रेजी जहनियत के थे।

उस समय रेडियो पर हिन्दी के और नयी चेतना के बहुत कम लोग बुलाये जाते थे। ज्यादातर बाईजीयों के ठुमरी - दादरों या गजलों, या कव्वालियों के प्रोग्राम होते थे। रिकॉर्डिंग की सुविधा नहीं थी। गायिकाएं या बाईजीयां वहां आती थीं और प्रोग्राम सीधे ब्रॉडकास्ट किया जाता था। इन बाईजीयों के पास शास्त्रीय संगीत की परंपरा थी और इनकी आवाज़ व सुरों में जादू भी था। उत्कृष्ट संगीत के बावजूद वातावरण रेडियो का तब मुजरेवाला, सामंती था।

नाटकों में ध्वनि प्रभाव

संगीत के अतिरिक्त दूसरा पक्ष था - वाचिक शब्द (स्पोकन बर्ड) का। इसमें वार्ताएं, नाटक, संगीत-रूपक समाचार आदि शामिल थे। वार्ताएं ज्यादातर उर्दू में होती थीं। संगीत-रूपकों मे एक विषय के अन्तर्गत कुछ विषयों को मिला कर पेश कर दिया जाता था। नाटक बड़े पुराने ढंग के होते थे, जैसे ‘कुर्तबा का काजी’, ‘खून-ए-नाहक’, ‘वेनिस का सौदागर’ आदि । नाटको पर पारसी थियेटर वाला रंग था। लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा था; बहुत अच्छे ढंग से ध्वनि-प्रभाव दिये जाते थे – ज्यादातर साउंड इफेक्ट के लिए बी.बी.सी. के रिकॉर्डों को काम में लाया जाता था। स्टूडियो में कोई उपकरण या साउंड इफेक्ट की व्यवस्था नहीं थी। हां, टीन की लहरीदार चादर स्टूडियो में लगी थी। जब बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज देनी होती थी तो उसे जोरों से खड़खड़ा दिया जाता था !

बाद में, जब हमने नाटक कम्पोज़ करने शुरू किये, तो मैंने यह सोचा कि नाटक में ध्वनि-प्रभाव महज उसकी प्रभावशीलता बढ़ाने या अलंकरण के लिए नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी एक अलग रचनात्मकता है। ध्वनियां वास्तविकता की प्रतीति करवाती हैं और हर घटना, हर वास्तविकता, हर स्थिति एक-दूसरे से अलग होती है।

वर्षा हर जगह एक ही तरह की नहीं होती है। सटूडियो में जो पानी बरसाने की व्यवस्था थी, उसे कभी झरना बना देते थे और कभी सुन कर लगता था, जैसे मोटर चल रही हो। यानी, ध्वनि का कोई मौलिक विधान या मौलिक प्रयोग नहीं था।

रेगिस्तान में नखलिस्तान

मनोरंजन के लिए बनाये गये कार्यक्रमों में, खासकर अनुवादित नाटकों में, देशी परंपरा और संस्कृति का संस्पर्श नहीं था। उर्दू के लेखकों जैसे शौकत थानवी आदि की प्रस्तुतियां हास्य रस प्रधान होती थीं। मनोरंजन के लिए पति-पत्नी के झगड़े तीसरे दर्जे में रेल का सफर, नौकर की कमी, मकान की तंगी आदि विषयों पर हल्के स्तर के नाटक ही ज्यादा तैयार किये जाते थे।

रेडियो में प्रोग्रामों के दो ही मुख्य भाग होते थे - संगीत और वाचिक शब्द। संगीत पक्ष में, शास्त्रीय संगीत की अच्छी परंपरा के बावजूद, उसका रूप मुजरे वाला ही था। वाचिक शब्द में, नाटक, वार्ताएं, संगीत-रूपक आदि थे। मजे की बात है कि संगीत-रूपक को पहले ‘म्यूजिकल फीचर’ ही कहा जाता था। इसे संगीत-रूपक नाम मैंने ही दिया था।

इस रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह थे उस जमाने के देहाती कार्यक्रम, जैसे 'पंचायत घर' । पं बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस' यह प्रोग्राम तैयार करते थे। वे बड़े ही मार्मिक कवि थे। तब मैं उन्नीस

वर्ष का था।

वे मुझसे उम्र में बड़े थे, पर हममें मित्रता थी। वे बड़े सुन्दर ढंग से सस्वर गीत सुनाते थे। आवाज बहुत मधुर थी। लेकिन बाना बिल्कुल देहाती था। गाढ़े का कुर्ता, गाढ़े का पाजामा, मोटी चप्पले और ऊंची पाढ़ की गांधी टोपी।

पढ़ीस जी के 'पंचायत घर' कार्यक्रम में अवधी के हास्य रस के कवि रमई काका भी थे।

पढ़ीस जी लोक गीतों को पसंद करते थे और हिन्दी, अवधी भाषा तथा गांव-देहात की देशी व सांस्कृतिक परंपरा का एक केन्द्र उनका 'पंचायत घर' कार्यक्रम ही था।

सवाल - समाचारों की भाषा का

रेडियो में दरअसल भाषा की समस्या का मतलब था समाचार की भाषा की समस्या। जब भी यह सवाल उठता था कि रेडियो की भाषा बहुत दुरूह है, कठिन है, तो उसका संबंध कार्यक्रमों की भाषा से नहीं होता था, क्योंकि विभिन्न रेडियो कार्यक्रमों की भाषा तो विषय के अनुकूल होती थी। इस सवाल का संबंध समाचारों की भाषा से ही था। नाटक की जो भाषा होगी जरा अधिक सरल होगी, बोलचाल की होगी। वार्ता की होगी तो वह विषय के अनुकूल होगी। ग्रामीण भाइयों के लिए या गांव के प्रोग्राम की भाषा उस प्रांत या क्षेत्र विशेष की बोली में होगी। संगीत की कोई भाषा ही नहीं होती। ज़्यादातर हमारा शास्त्रीय संगीत ब्रजभाषा में निबद्ध है।

लिहाजा भाषा का जब सवाल उठता है तो मूलतः वह समाचार की भाषा होती है। वह एक symbol यानी प्रतीक होती है रेडियो के चरित्र की। बुखारी के समय में यह भाषा बहुत कठिन, फारसी से बोझिल उर्दू थी। जो उर्दू आम आदमी की जबान मानी जाती रही है उसमें हिन्दी-उर्दू का रसायन हुआ है, जिसे सामासिक संस्कृति कहते हैं। मैं समझता हूं कि यह सामासिक नहीं बल्कि हमारी ही संस्कृति है। शब्दों के पीछे भी बड़ा छलावा है। दो संस्कृतियों का जोड़ कहना गलत होगा, हजारों साल की ऐतिहासिक प्रक्रिया में यह रसायन हुआ है। दो संस्कृतियों की टकराहट से, तुलनात्मक प्रक्रिया से उसका एक तीसरा रूप उभरा है, यह संयोजन की खिचडी नहीं है।

प्रश्न हिन्दी उर्दू का नहीं था। प्रश्न यह था कि जो प्रतीक भाषा हो यानी समाचार की भाषा हो - यह सहज, सरल बोधगम्य हो या सस्कृत गर्भित या फारसी से बोझिल हो। 'बेनुअल अख्यामी इदारा इस्तेमाल होता था international areas के लिए। साहित्य के प्रोग्राम के लिए कहा जाता था 'अदब के रूप' या 'शायर की जुबान से' या कहा जाता था 'मौसिकी का प्रोग्राम नस्त्र किया जाता है'। 'डेसिमल' को 'अशारिया' कहते थे - 'इतने अशारिया इतने पर प्रोग्राम नस्त्र कर रहे हैं। इससे कठिन भाषा थी समाचार की।

नये कार्यक्रम

देश का विभाजन हुआ तो अधिकाश अनुभवी अफसर पाकिस्तान चले गये। मेरा ट्रांसफर जब दिल्ली से लखनऊ रेडियो में हुआ, तब से लेकर मेरे अमरीका जाने तक के वर्ष रेडियो में भारतीय जहनियत के कार्यक्रमों की नीव रखने के वर्ष थे। हिन्दी के अनेक कार्यक्रमों की मैंने नीव रखी, कई को नये नाम दिये जैसे 'वाचक वाचित' मेरा दिया हुआ नाम है। संगीत रूपक की जगह पद्म नाटक आरम्भ किये गये। तीन साल तक, हर सप्ताह, मैंने आठ बजे पत्रों के उत्तर दिये। इसमें ऐसी मानक भाषा रखी जिसमें सहज संप्रेषण था और जो जीवंत भाषा थी, यह एक ऐसी रचनात्मक भाषा थी जिसमें हिन्दी उर्दू का सवाल ही नहीं था ।

सन् 48-49 के दौरान रेडियो में कुछ नये लोग आये जिनमें पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी, डॉ नगेन्द्र, श्री थी. पी. भट्ट उल्लेखनीय थे। श्री वी. पी. भट्ट ने डिप्टी डायरेक्टर का पद सम्भाला और इन लोगों ने सूचना व समाचार का दायित्व निभाया। समाचारों की भाषा के लिए तय हुआ कि जितने फारसी के शब्द है उन्हें काट कर हिन्दी के शब्द रखे जायें।

अब सवाल यह उठा कि हिन्दी शब्दों के लिए संस्कृत स्रोत पर जायें या देशज व हिन्दुस्तानी स्रोत पर ।

रेडियो की नयी भाषा नीति

1946 में हमारे प्रथम सूचना व प्रसारण मंत्री थे. दिवाकर जी। उन्होंने सरदार पटेल से लिख कर पूछा कि रेडियो के लिए भाषा नीति क्या होनी चाहिए। सरदार वल्लभभाई पटेल ने पत्र के उत्तर में जो लिखा, वह आज भी उतना ही सार्थक व महत्वपूर्ण है जितना कि तब था।

दिवाकर जी उन दिनों राज्यमंत्री थे और सरदार पटेल गृहमंत्री । दिवाकर जी ने उन्हें 5 दिसम्बर 1949 को पत्र लिखा था कि भाषा के संबंध में क्या नीति होना चाहिए।

14 दिसम्बर 1949 को सरदार पटेल ने बड़ा ऐतिहासिक उत्तर दिया। मुझे याद है कि उन्होंने लिखा था कि जो हमारी राष्ट्रीय भाषा नीति है सिर्फ उसे ही प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए रेडियो में, बल्कि उसका लक्ष्य बड़ा व्यापक है। मतलब यह कि हमारा मकसद सिर्फ राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रसार तक सीमित न हो बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भाषा के माध्यम से रेडियो सामान्य जन तक पहुचे। यानी भाषा वह इस्तेमाल करें जो सामान्य जन इस्तेमाल करते हों, फिर वह भाषा चाहे हिन्दुस्तानी हो, हिन्दी हो या उर्दू मिश्रित बोलचाल की भाषा हो जिसे अधिकतम लोग समझ सकें।

पर इससे सम्बद्ध एक और भी प्रश्न उठता है। (क्रमशः)

आकाशवाणी की कहानी गिरिजा कुमार माथुर की ज़बानी

- (शेषांश) -

इससे सम्बद्ध एक प्रश्न यह उठता है कि भाषा की अपनी गरिमा होती है, अच्युत अस्मिता होती है, गम्भीरता होती हैं, तो अगर आप इतनी मामूली भाषा अपना लेंगे तो वैचारिक, रचनात्मक या वैज्ञानिक विषयों के लिए कौन सी भाषा लेंगे? जवाब में उनका कहना था कि सहज भाषा में भी अपनी गरिमा, अस्मिता और गम्भीरता हो सकती है। रामचरितमानस का उन्होंने उदाहरण दिया कि वह भाषा सर्वसाधारण की समझ में आती है।

रेडियो की भाषा का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य यही है न कि हमारा संदेश अधिकाधिक जनता तक पहुंचे! हम ऐसी भाषा का इस्तेमाल क्यों करें जिससे रेडियो के प्रसारणकर्ता, उद्घोषक और श्रोता के बीच गहरी खाई पैदा हो जाय - जैसा कि आजकल है!

आज जो कृत्रिम भाषा या अनूदित भाषा बनायी है, जो प्रचलित 'है प्रारूपों में, वैधानिक रूपों में, वह तो हमारे समय में भी नहीं थी। यह बहुत बड़ी खाईं पैदा हो गयी है जनता, शासन, सरकार और भाषा में। यह हमारी ज़िन्दगी से उपजी ऐतिहासिक प्रक्रिया से जन्मी भाषा नहीं है। पटेल ने कहा था कि 'लिटरैरी क्लब' नहीं है रेडियो।

हिन्दी ऐसी भाषा है जिसमें आत्मसात करने की असीम क्षमता है और अस्वीकार करने की भी क्षमता है। अंग्रेज़ी में भी यह बात है। जिस भाषा में आत्मसात करने की क्षमता होती है, वह जरा से रंगों से रूप बदलती है। कहीं शब्दों का प्रगाढ़ रंग हो गया तो वह वैचारिक भाषा बन जायेगी, कहीं ज़रा सा हल्का रंग हो गया तो वह सर्वसाधारण की भाषा बन जायेगी। इसमें यह नहीं कि एक ही भाषा के समानान्तर रूप हों जैसे वैचारिक भाषा अलग है, साहित्यिक भाषा अलग है। जनसंचार के माध्यम से प्रसारण की और सर्वसाधारण की भाषा अलग है।

खबरों की चीर-फाड़

पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी (भैया साहब) जिनका अभी देहावसान हुआ है, हमारे गुरुजनों में थे। वह डिप्टी डायरेक्टर बन कर रेडियो में आये थे। उनसे कहा गया था कि आप समाचार देखिए। वह कहते थे कि समाचार मैं क्या देखूं। जब बुलेटिन प्रसारित हो जाता है तब उसकी प्रतिलिपि मेरे पास आ जाती है चीर-फाड़ करने के लिए!

वह क्या देखते थे कि इतने उर्दू फारसी के शब्द आये, इतने हिन्दी के इतने सहज शब्द आने चाहिए थे – इस प्रकार शब्दो की गिनती होती रहती थी। जब डॉ. नगेन्द्र आये, उन्होंने हिन्दी का मानक रूप दिया। उन्होंने समाचार की भाषा स्वयं बनाने की पेशकश की। इससे पहले रेडियो में बहुत समय तक अग्रेजी में मुख्य बुलेटिन बनते थे, जिनके फिर हिन्दी में अनुवाद होते थे। इस परिपाटी को पहले डॉ. नगेन्द्र ने और फिर वात्स्यायन जी ने तोड़ा।

व्यापक दृष्टिकोण

रेडियो के इतिहास का तीसरा दौर सन् 54 से 61 तक का रहा। यह दौर पं. जगदीश चन्द्र माथुर का था। वह बड़े प्रतिभाशाली व्यक्ति थे।

वह आई.सी.एस. थे और साहित्यिक भी थे। उन्होंने सारे देश को सामने रखा। उनके समय में राष्ट्रीय कार्यक्रम तैयार हुए।

विविध भारती', 'नेशनल प्रोग्राम ऑफ म्यूज़िक', 'नेशनल प्रोग्राम ऑफ टॉक्स' उनके समय में शुरू हुए। उस समय बी. बी. केसकर मंत्री थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय संगीत को महत्व दिया।

पं. जगदीश चन्द्र माथुर आधुनिक विचारों के आदमी थे। वह विद्वान थे, कला व संस्कृति के मर्मज्ञ थे और कवि भी थे। 'कोणार्क' नाटक है उनका। उनका दृष्टिकोण बड़ा व्यापक था। उन्होंने सर्वभाषा कवि-सम्मेलन किया। बी.बी.सी. उनका आदर्श था। बी.बी.सी. के नाटकों के प्रोग्राम बहुत अच्छे होते थे।

उन्होंने बी.बी.सी. की तरह ही नियमों की पाबंदी का आदर्श निभाया। आप प्रोग्राम के प्रसारण समय से अपनी घड़ी मिला सकते थे। अगर प्रोग्राम में निश्चित समय से थोड़ा सा भी ज्यादा समय लगा, तो फौरन 'एक्सप्लानेशन' 'कॉल' हो जाता था। स्टाफ ज्यादातर साल-साल भर के कंट्रैक्ट पर रखा जाता था। इसलिए, जरा सी भी चूक पर नौकरी जाने का खतरा बना रहता था।

रेडियो पर विदेशी प्रभाव

संक्षेप में कहें तो उस समय रेडियो का जो स्वरूप था, उसमे सामंती वातावरण का बोलबाला था। प्रोग्रामों पर विदेशों से आयातित और आरोपित मूल्य हावी थे। मनोरंजन में सतही हो-हल्ला था। एक खास बात यह थी कि रेडियो कार्यक्रम जनता से दूर या कटे हुए थे।

वैसे, लखनऊ उस समय संस्कृति का केन्द्र था। साहित्यकार थे। उर्दू हिन्दी के विद्वान थे। दिग्गज पत्रकार थे। नृत्य के क्षेत्र में शंभू महाराज, अच्छन महाराज थे। बड़े-बड़े शिक्षाविद् थे - प्रो. सिद्धान्त, डॉ. लक्ष्मी मेनन, राधाकमल मुकर्जी, डॉ. बड़थ्वाल । प्रतिभाशाली व्यक्ति जैसे सज्जाद ज़हीर, अली सरदार जाफरी, आदि थे। उदयशंकर जी थे, जिनका 'मशीन' बैले लोगों ने बेहद पसंद किया था। लेकिन रेडियो का इस सारी गहमागहमी से, साहित्य से, नयी चेतना से और वैचारिक मंथन से दूर का भी सरोकार नहीं था। इन सारी गतिविधियों की स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के अधिवेशन तक की कहीं कोई सूचना या समाचार रेडियो में नहीं होता था।

अपनी संस्कृति की ओर

उस ज़माने में रेडियो सीलोन लोग ज्यादा सुनते थे। श्री जगदीश चन्द्र माथुर ने शास्त्रीय संगीत का राष्ट्रीय प्रोग्राम तैयार किया, नाटकों का राष्ट्रीय प्रोग्राम तैयार किया, और इस प्रकार भारतीय परंपराओं से रेडियो को जोड़ कर जन-मानस की रुचि व चेतना अपनी समृद्ध संस्कृति की ओर जगायी। 'विविध भारती' का लोकप्रिय कार्यक्रम तैयार करके रेडियो को एक आधुनिक रूप देने का बड़ा काम किया।

'फार्म फोरम' प्रोग्राम जगदीश चन्द्र माथुर के ज़माने में शुरू हुआ। प्रथम 'फार्म फोरम' की अन्तर्योजना मैंने चलायी। श्री एस. एन. मूर्ति स्टेशन डायरेक्टर थे। प्रोग्राम अधिकारी उन दिनों वरिष्ठ अफसर होता था, जो हमारे प्रोग्राम नियंत्रित करता था। मैंने प्रोग्राम अधिकारी के रूप में 'फार्म फोरम' के लिए उन्नाव जिले और बाराबंकी में फोरम बनाये थे। हम हर हफ्ते दो-तीन गांवों में जाते थे और वहां लोगों को उत्साहित करते थे कि हम आपको रेडियो प्रोग्राम में बुलायेंगे। हम उनसे 'फीड बैक' लेते थे, मालूम करते थे, कि उनको कार्यक्रम में जो सूचना दी गयी थी उसको उन्होंने कार्यान्वित किया या नहीं; कार्यान्वयन में उनको क्या तकलीफ हुई, क्या परेशानी हुई, आदि।

इसी तरह नयी स्वास्थ्य योजनाओं को बढ़ावा देने के लिए हमने 'फार्म फोरम' का इस्तेमाल किया। मसलन, कहीं हैजा फैला, तो हमने अपने 'फार्म फोरम' से घोषणा कर दी कि अमुक जगह हैजा फैला है; सिविल सर्जन ने सुना तो फ़ौरन वहाँ सहायता भेजी। पहली बार रेडियो पर मैंने 'फार्म फोरम' को जो रूप दिया वह यह था कि रेडियो को जनता तक ले जाना है।

श्रोताओं की प्रतिक्रिया जानना, यह पहली मर्तबा हुआ लखनऊ में। मैंने यह काम लगातार तीन साल तक किया : 1948 से 1950 तक। इसके बाद एक बड़ा आयोजन हुआ, जिसमें 'फार्म फोरम' का उदाहरण सामने रख कर कहा गया कि इस तरह तय की गयी योजना के अनुसार रेडियो को जनता तक ले जाना चाहिए। इस आशय की सूचना अन्य स्टेशनों ने नहीं दी, लेकिन लखनऊ रेडियो ने इस बात को बड़े ज़ोर से कहा।

दूसरा काम यह किया कि सर्वभाषा कवि सम्मेलन में सभी भाषाओं के अधिकतम कवियों की कविताएं प्रसारित की । 1955 से 1970 तक मैंने लगातार यह काम किया।

तीसरा काम यह किया कि विज्ञान संबंधी प्रयोगधर्मी और अन्तरिक्ष विज्ञान के कार्यक्रमों का मैंने नये सिरे से प्रसारण किया।

'अवांतर गृह' शीर्षक मेरा नाटक एक नयी तरह का नाटक था, जिसे लोगों ने बहुत सराहा।

'फार्म फोरम' प्रोग्राम, राष्ट्रीय कार्यक्रम और नाटक केवल हिन्दी में ही नहीं बल्कि सब भाषाओं में प्रसारित होते थे। जब राष्ट्रीय चेतना का संदेश व्यापक रूप में जनता तक पहुंचाने और भावनात्मक रूप में हर भाषा को सम्मान देने का एक नया रूप रेडियो का उभरा, तो सत्ता ने समझा कि यह तो एक बड़ा शक्तिशाली माध्यम है; क्यों न इसका उपयोग किया जाय! बाद में इसका प्रचार के रूप में उपयोग किया जाने लगा।

लेकिन 1950 से 65 तक रेडियो का रूप बड़ा विकसित, गरिमामय, साहित्यिक, सांस्कृतिक और जनसंपर्क वाला था। सामान्य जन तक पहुंचने की उस मूल्यवान कोशिश को आज यदि छोड़ दिया जाता है, तो रेडियो का बहुत बड़ा अहित होगा।

कल्पना को छोड़ कर वास्तविकता को परखने और उससे मुठभेड़ करने की क्षमता ही रेडियो की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है। उसकी विश्वसनीयता तभी कायम हो सकती है, जब जन-संपर्क के इस माध्यम को प्रोपेगैण्डा की तरह इस्तेमाल न किया जाय; सत्ता में परिवर्तन के साथ हर सत्ता इसे अपना हथियार न बनाये।

सरकारी संस्था होते हुए भी, 1950 से 1965 के बीच उसने सरकार का कोई अंकुश नहीं माना। इस प्रकार का ऑर्डर था कि किसी मंत्री या पार्टी के नाम को काटने या उसे मना करने को आप स्वतंत्र हैं।

सवाल स्वायत्तता का

साहित्य, संस्कृति और जन-संचार की अपनी एक स्वायत्तता होती है। यह स्वायत्तता उसका मौलिक गुण और मौलिक अधिकार है, चरित्र है। उसके इस चरित्र को यदि कोई सत्ता, पार्टी, शासन या व्यक्ति जो रेडियो को नियंत्रित करता है, नहीं समझता और उस पर अपना निहित स्वार्थ या व्यक्तिगत प्रभाव जमाना चाहता है। तो वह साहित्य और संस्कृति के मौलिक चरित्र पर कुठाराघात करेगा।

यदि संचार माध्यम को आत्म-प्रचार या सत्ता के अति-प्रचार का माध्यम बनाया जायगा, तो कालांतर में निश्चय ही वही सत्ता को उखाड़ फेंकने का कारण बनेगा। या तो वह सत्ता को बदल देगा या खुद बदल जायगा ।

मुझे आशा है कि स्वायत्तता के वर्तमान फैसलों के तहत गवर्नर्स की जो कमेटी बनायी गयी है, वह सुचारू रूप से काम करेगी। व्यक्तिगत अहं, स्वार्थ, प्रभाव और प्रभुता से संचार माध्यमों को क्षति पहुंचती रही है। इस कुरीति को अब सचेतन रूप से दूर किया जायगा, यह आशा की जानी चाहिए।

जिस देश में साहित्य, संस्कृति व संचार माध्यमों की आजादी खत्म हो जाती है, उसकी अपनी आज़ादी भी खत्म हो जाती है।

*सचेतक से साभार

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