श्री देशना संग्रह
मेरे राम कहां नहीं हैं?
28 जनवरी 2026
सर्वत्र हैं वे।
वे अयोध्या की सीमाओं से बाहर परिव्याप्त हो गये हैं।
वे शबरी की कुटिया में हैं।
वे निषाद राज की झोपड़ी में हैं।
वे किष्किंधा के वनवासियों में हैं।
वे असहाय के आंसू में हैं।
वे निर्धन की आह में हैं,
वे हारे के हरिनाम हैं।
वे कबीर की कविता में निर्गुण राम के रूप में हैं।
वे नानक की रचनाओं के रघुनाथ हैं।
वे गुरु गोविंद सिंह के रामावतार और विचित्र नाटक हैं ।
वे असमिया जनजातियों के सखा राम हैं,
और उनकी परम्पराओं में परिव्याप्त हैं ।
वे इंडोनेशिया के प्रामवनन मंदिर की दीवारों पर लीला रत हैं ।
वे जावा द्वीप में लोरा जोन रंग मंदिर की दीवारों पर अधिष्ठित हैं ,
और कहीं दूर से संसार की क्षुद्र वासनाओं को देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।
वे थाई रामलीला में मूर्छित लक्ष्मण के सिरहाने शोकार्त होकर बैठे हैं ,
और भ्रात्र स्नेह में विह्वल हैं।
वे कंबोडिया नरेश के रायल पैलेस की दीवारों पर विविध रूपों में शोभायमान हैं
वे कम्बोडिया की खमेर रामलीला में दृष्टिगोचर हैं।
वे अंकोरवाट मंदिर की भित्तियों पर रावण से युद्धरत हैं।
वे मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल में खोतानी रामायण के रूप में परिव्याप्त हैं।
एवं
पेरिस के बिबलोथिका संग्रहालय में बाली - सुग्रीव की कहानी के रूप में विराजमान हैं।
लाओस में वे फ्रलक फ्रराम के रूप में है।
तो मलेशिया में वे हिकायत श्रीराम हैं ।
वे वियतनाम के चंपा साम्राज्य के ध्वंसावशेषों में परिलक्षित हैं।
वे बाली द्वीप के केडेक नृत्य की अग्नि ज्वालाओं में प्रतिभासित हैं।
वे बाली द्वीप की उफनती अयुंग नदी की चट्टानों पर शोभायमान हैं।
वे बर्मा की यमा जटा रामायण में परिलक्षित हैं।
वे थाईलैंड की रामलीला में हैं।
वे थाईलैंड की अयोध्या में हैं।
वे थाई राजपरिवार में उपाधि के रूप में हैं।
वे इंडोनेशियाई रामलीला में मुस्लिम पात्रों के रूप में हैं।
वे इंडोनेशिया के बोनोबायो गांव के खेतों में ,
प्राचीन स्वर्ण कटोरों के ऊपर लीला रत हैं।
मेरे प्रभु अति क्षमाशील हैं।
जब राजनीतिक असुर उन पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं,
तो वे केवल मंद मंद मुस्कुराते हैं,
और उन्हें छोड़ देते हैं नियति के न्याय पर।
वे युद्ध में रावण का अहंकार देखकर भी मुस्कुराये थे।
वे तभी तो धीरोदात्त हैं
वे अनन्त हैं।
वे अपार हैं।
दयासागर हैं मेरे प्रभु।
सुनील पाठक
