श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

गुरु का अर्थ

28 जनवरी 2026

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 (1)(पढ़ने के आधार पर गुरु,आचार्य,पुरोहित, पंडित,पुजारी, ब्राह्मण,के बारे में सूक्ष्म में बताने की कोशिश कर रही हूँ कुछ गलत हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ)अक्सर लोग पुजारी जी को पंडित जी या पुरोहित जी को आचार्य भी कह देते हैं और सुनने वाले भी उन्हें सही मान लेते हैं।यह विशेष पदों के नाम है जिनका किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं।                            गुरू--गू का अर्थ अंधकार और रू अर्थ प्रकाश अर्थात जो व्यक्ति आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है।गुरु का अर्थ अंधकार का नाश करने वाला। प्रत्येक गुरू संत तो हो सकते हैं पर प्रत्येक संत गुरू हो यह जरूरी नहीं।केवल कुछ संतों में ही गुरू बनने की पात्रता होती है।गुरु काअर्थ ब्रह्मज्ञान का मार्गदर्शक।            आचार्य --आचार्य उसे कहते हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो और जो गुरुकुल में विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य करता है।आचार्य का अर्थ यह है कि जो आचार,नियमों और सिद्धांतों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और दूसरों को उसकी शिक्षा देता हो। पुरोहित--दो शब्दों से बना है पर तथा हित अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दूसरों के कल्याण की चिंता करें। प्राचीन काल में आश्रम प्रमुख को पुरोहित कहते थे जहाँ शिक्षा दी जाती है। हालांकि यज्ञ कर्म करने वाले मुख्य व्यक्ति को भी पुरोहित कहा जाता है। प्राचीन काल में राजघरानों में भी राज दरबार में पुरोहित नियुक्त होते थे, जो धर्म कर्म का कार्य देखने के साथ ही सलाहकार समिति में शामिल होते थे।  पंडित--पंड का अर्थ विद्वता से था। किसी ज्ञान में पारंगत होने को ही पांडित्य कहते हैं। पंडित का अर्थ होता है किसी ज्ञान विशेष में दक्ष या कुशल। इसे विद्वान या निपुण भी कह सकते हैं। किसी विशेष विद्या का ज्ञान रखने वाला ही पंडित होता है।प्राचीन भारत में वेद शास्त्रों आदि के बहुत बड़े ज्ञाता को पंडित कहा जाता था।                     पुजारी--किसी देवी-देवता की मूर्ति या प्रतिमा की पूजा पूरनेवाला व्यक्ति,पूजा कराने वाला, चढ़ावा लेने वाला,यात्रियों को पूजा के अनुष्ठान और विधियाँ बताने वाला,पंडा,पण्डित,इंसान से मुहब्बत करने वाला,चाहने वाला

पूजा करने वाला व्यक्ति,किसी मंदिर में नियमित रूप से पूजा करने वाला व्यक्ति,

जो किसी के लिए समर्पित हो,जैसे-प्रेम पुजारी,धन का पुजारी। पुजारी को भगवान के लोगों की सेवा करने के लिए,उन्हें भगवान के साथ एकता में ले जाने के लिए एक पवित्र शक्ति दी जाती है।             ब्राह्मण --ब्राह्मण शब्द ब्रह्म से बना है जो ब्रह्म ईश्वर को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता वह ब्राह्मण कहा जाता है।जो पुरोहित पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं याचक है,जो ज्योतिष और नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं ज्योतिषी है।ब्राह्मणों ने मंदिरों में पुजारी बनने, पूजा-पाठ कराने, हवन कराने,जन्म और मरण के वक़्त अनुष्ठान करने, वेदों और पुराणों को पढ़ने के अधिकार को सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राह्मण जाति के लिए ही आरक्षित रखा।

 रजनी मिश्रा

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