श्री देशना संग्रह
बचपन और बाल साहित्य
8 जनवरी 2026
-हेमचन्द्र सकलानी
आज हमारी सामाजिक कार्य प्रणाली, सोच-विचार में व्यापक परिवर्तन आ चुका है, पर समय की मांग है कि बचपन और बाल साहित्य पर सभी गम्भीर, चिंतन, मनन, मंथन करें तथा प्रयास करें जो बच्चों को उनका बचपन तथा बाल साहित्य वापस दिलायें। जिस संस्कृति का हम गर्वित होकर गुणगान करते हैं सच तो यह है कि उससे हम पूरी तरह कट चुके हैं फिर उसे हमारे बच्चे कैसे अपना सकते हैं। आज हर कोई चाहता है कि उसके बच्चे बचपन से न गुजर कर सीधे बड़े हो जायें।
पहले हर समाचार पत्र, पत्र, पत्रिकाएं बच्चों के लिए अपने विशेष साप्ताहिक, मासिक बाल पृष्ठ निकाला करते थे। जिन्हें बच्चे बड़े चाव व मनोरंजन से पढ़ा करते थे। आज उन पृष्टों पर विज्ञापनों, फिल्मी हीरो, हिरोईनों की फोटो, मनगड़ंत खबरें, या क्रिकेट की खबरें छायी रहती हैं। आज बच्चों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व मात्र यह कहना रह गया है कि यह मत करो, वह मत करो, पढ़ाई करो, या फिर अनके कन्धों पर भारी भरकम बस्ता डाल कर फिर शाम को खेलने के समय उन्हें टयूशन भेज कर, बिना उन्हें नैतिक शिक्षा दिए, उनके बचपन को परिवार के अन्दर, कमरों के अन्दर, कैद कर, समाज से काट कर हम समझते हैं कि हमारे उत्तरदायित्व पूरे हो गये हैं। अब उनका सर्वागीण विकास होगा और अब वे एक अच्छे नागरिक बन जायेंगे। जबकि सत्य यह है कि हम उन्हें उनके बचपन से काट कर, समाज से दूर रख कर उनके बचपन में अवरोध पैदाकर, रूकावट पैदाकर उनके स्वाभाविक विकास को प्रभावित करते हैं। आज हम बचचों को आधुनिक अंग्रेजी साहित्य पढ़ा कर, पेप्पसी जैसे पेय पिलाकर, बर्गर खिलाकर, आधुनिक मिनी परिधान पहना कर, पश्चिमी चाल चलन से लकदक देख गर्व का अनुभव करते नहीं थकते, पर दो पैसे बच्चों के लिए बाल साहित्य पर खर्च नहीं कर सकते और गाते भारतीय संस्कृति के गीत हैं।
बचपन भविष्य की जमीन होती है, भविष्य की आधारशिला होती है, भविष्य की पहली सीढ़ी होती है। जब भी कोई बच्चा जन्म लेता है तो प्राकृतिक रूप से अपनी असीम छमता और विकास की सम्भावनाओं को लेकर पैदा होता है। जिस तरह प्राकृतिक रूप से पेड़, पौधे, वनस्पति का विकास होता है उसी तरह बच्चों में भी प्राकृतिक रूप से सीखने की और उत्सुकता की भावना का विकास जन्म के साथ ही विकसित होने लगता है। यही भावना, प्रवृति उसको उन्नति, विकास की ओर जाने को प्रेरित करती है। ऐसे समय अच्छा बाल साहित्य उसका सही व्यक्तित्व निखारने में सहायक हो सकता है। यदि रोचकता के साथ, नैतिक शिक्षा के साथ उसे बाल साहित्य पढ़ाएं, सुनाए, बताएं तो निःसंदेह उसका आदर्शपूर्ण विकास होगा। इन सबके विपरीत हम उन्हें सिर्फ जीवन यापन, अच्छी रोजी रोटी कमाने चाहे किसी भी सही गलत तरीके से कमायी जाये, गाड़ी खरीदने, बड़ी आलीशान कोठी बनाने लायक बना देने भर से, उसे अपने से आगे बढ़ाने, अपने अनुसार ढालने से अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। समय को कोसना यह कह कर कि समय बहुत बदल गया है मात्र हमारा उददेश्य रह गया है। जबकि सच यही है कि समय आज भी वैसा ही है जैसा वर्षोंं पहले था। आज भी अपने समय पर सूरज, चॉंद, तारे निकलते हैं, पेड़, पौधे उगते हैं, अपने समय पर उनमें फूल आते हैं, अपने समय पर उनमें फल आते हैं, अपने समय पर फसलें पकती हैं अपने समय पर मौसम बदलते हैं, अपने समय पर सर्दी, गर्मी, बरसात आती है। शायद ही नही यकीनन मनुष्य की ही सोच, विचार, आदतें बदल गयीं हैं।
स्व.महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा था - जिस तरह अच्छा खादय पदार्थ शरीर को स्वस्थ सुंदर ताकतवर बनाता है उसी तरह उसी तरह अच्छा साहित्य मनुष्य के मन, मस्तिष्क, सोच, विचार की सुंदरता के लिए खादय पदार्थ का कार्य करता है। अच्छा बाल साहित्य बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अति आवश्यक श्रेणी में आता है। बच्चों के बचपन को तथा उससे सम्बंधित विषयों को सुरक्षित रखने के प्रयास किये जाने चाहिये। बचपन की अच्छी स्मृतियॉं, वृद्वावस्था का सबसे खूबसूरत सहारा होती है। मुझे स्व.जगजीत सिंह की गजल की पंक्तियॉं याद आती हैं-‘‘ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले ही छीन लो तुम मुझ से मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन, वो कागज की किश्ती वो बारिश का पानी।’’
सार्थक उपयोगी कल्पना, यथार्थ की जमीन की पहली शर्त होती है। लेकिन आज हमारी आबादी, और जीवन संघर्ष इतने बढ़ गये हैं कि बचपन ही क्या मानवता, नैतिकता, तहजीब, सभ्यता, संस्कृति, मानवीय संवेदना सभी के मूल्य गिर गये हैं। बचपन आज परिवार, समाज, और संघर्षों का बंधक बन कर रह गया है। उसे अच्छा साहित्य नहीं मिलता इसके विपरीत माता, पिता, आज का पारिवारिक वातावरण, दोस्त, स्कूल का वातावरण, स्वार्थीपन, फिर घर में आज के दूरदर्शन के कार्यक्रम उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक पुस्तक बन कर रह गये हैं। विशेषकर कार्टून सीरियल्स ने तो बच्चों का जैसे बचपन ही छीन लिया है।
आज सब अपने बच्चों को नेता, डाक्टर, इंजीनियर, कलक्टर, बिजनैस मैन बनाना चाहते हैं पर साहित्यकार कोई नहीं बनाना चाहता है जबकि सभी जानते हैं साहित्यकार सच्चा, ईमानदार, अच्छे विचारों वाला, आदर्शवादी होता है भले ही वह गरीब, निर्धन हो। हम भूल गये हैं कि हमारे देश का स्वर्ण युग तभी स्वर्ण युग कहलाया जब उस युग में साहित्य अपने सर्वोच्च शिखर पर था। सारे वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत की रचना उस समय हुई थी। साहित्य इसलिए सर्वोच्च शिखर पर था क्योंकि उस समय हमारी सभ्यता, संस्कृति शिखर पर थी और सभ्यता, संस्कृति इसलिए सर्वोच्च शिखर पर थी क्योंकि मनुष्य में, समाज मे ईमानदारी, आदर्श, सिद्वान्त, नैतिकता, चरित्र, मानवीय मूल्य, गरीबी, निर्धनता की अवस्था में भी र्स्वोच्च शिखर पर थे। आज इन्हीं चीजों की बच्चों में विकसित करने उन्हें देने की आवश्यकता है यदि हम बच्चों का ही नहीं समाज का देश का भविष्य उज्जवल चाहते हैं।
1/240 विद्यापीठ मार्गविकास नगर
देहरादून।
