श्री देशना संग्रह
देने का आनंद-अभाव में भी उदारता की विजय
6 जनवरी 2026
सन् 1963 का समय हमारे लिए आर्थिक दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। हमारी संपत्तियाँ और देनदारियाँ बराबर थीं-न कोई कर्ज़, न कोई पूँजी। व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए तरल धन की आवश्यकता थी, परंतु साधन सीमित थे। ऐसे समय में हमने अपने परिवार की गृहलक्ष्मियों से एक कठिन किंतु ईमानदार निवेदन किया-अपने आभूषणों के योगदान का, जिनमें से कुछ उनका स्त्रीधन भी था।
हमने अपनी आर्थिक स्थिति उन्हें पूरी पारदर्शिता के साथ समझाई और यह स्पष्ट वचन दिया कि जैसे ही हालात सुधरेंगे, हमारा पहला कर्तव्य उनके गहने लौटाना होगा। यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं था, बल्कि विश्वास, त्याग और पारिवारिक एकता की अग्नि-परीक्षा थी।
ईश्वर की कृपा और सतत पुरुषार्थ से, मात्र आठ वर्षों में हमने अपना वचन निभाया और समस्त आभूषण नये बनाकर उन्हें ससम्मान लौटा दिए। उस दिन यह अनुभव हुआ कि विश्वास पर टिकी अर्थव्यवस्था कभी दिवालिया नहीं होती। इस पूरे संघर्षकाल में भी मेरे पिताजी की दानशील प्रवृत्ति कभी रुकी नहीं। अभाव ने उनके हाथ नहीं बाँधे, बल्कि हृदय को और व्यापक किया। हमारे गाँव सियाट(सोजत) में धान और अनाज के भंडारण हेतु एक शेड/गोदाम का निर्माण कराया गया, जो गायों और कबूतरों के दाने तथा सूखी घास (चारा) के मुआना के लिए समर्पित था। यह सब तब हो रहा था, जब चेन्नई में हमारा स्वयं का घर तक नहीं था।
राजस्थान में भी हम अपने दादा से प्राप्त एक छोटे से पुश्तैनी आश्रय में रहते थे। सुविधाएँ सीमित थीं, पर संकल्प असीम। उस समय यह स्पष्ट हुआ कि देने के लिए पहले सब कुछ होना आवश्यक नहीं-देने की भावना ही सबसे बड़ी संपत्ति है। यही कारण था कि हमारी देने की यह यात्रा किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि आनंद और संतोष के साथ निरंतर आगे बढ़ती रही।
यह अनुभव सिखाता है कि जब दान कर्तव्य नहीं, संस्कार बन जाता है, तब अभाव भी पुण्य में बदल जाता है- और जीवन स्वयं एक साधना बन जाता है।
(क्रमशः )
सुगालचंद जैन, चेन्नई
