श्री देशना संग्रह
लिपि, चित्र और इमोजी ;संप्रेषण के माध्यमों का विकासात्मक अध्ययन
7 जनवरी 2026
डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर और पढ़कर अपने मनोभावों तथा विचारों का आदान– प्रदान करता है। प्रयोग की दृष्टि से भाषा के दो प्रमुख रूप माने जाते हैं—मौखिक और लिखित। मौखिक संवाद में मुख और कानों की सक्रिय भूमिका होती है, जबकि लिखित अभिव्यक्ति के लिए लिपि अनिवार्य है। वस्तुतः लिपि भाषा को स्थायित्व प्रदान करती है और ज्ञान को पीढ़ी- दर -पीढ़ी सुरक्षित रखने का माध्यम बनती है।
लिपि का विकास सहज और त्वरित नहीं होता। किसी भी लिपि के सामाजिक व्यवहार में स्थापित होने में कई दशकों, बल्कि सदियों का समय लग जाता है। भारतीय इतिहास में इसका सशक्त उदाहरण मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेख हैं। पुरातात्विक खुदाइयों में प्राप्त इन अभिलेखों में प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि (जिसे उस काल में धम्म-लेखों की लिपि कहा गया) कालांतर में पठन-परंपरा से लुप्त हो गई थी। नंदों और मौर्यों के पतन के बाद भारत में ऐसे विद्वान नहीं बचे थे जो इस लिपि को पढ़-समझ सकें। परिणाम- स्वरूप, लगभग दो हजार वर्षों तक अशोक के शिलालेख मौन साक्षी बने रहे।
ब्रिटिश शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी एवं विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने सन् 1837 ई. में ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता प्राप्त की। आज तक अशोक के लगभग 40 प्रमुख अभिलेख ज्ञात हो चुके हैं। इन शिलालेखों की इबारतों के प्रकाश में आने से भारतीय इतिहास का एक अत्यंत दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण अध्याय उद्घाटित हुआ, जिसने विश्व को भारत की प्राचीन मानवीय, नैतिक और प्रशासनिक दृष्टि से चमत्कृत कर दिया। इस प्रकार दस्तावेज़ीकरण और ऐतिहासिक स्मृति के संरक्षण में लिपियों का योगदान अनुपम है।
जहाँ लिपि ज्ञान को शब्दों में बाँधती है, वहीं चित्र भावों और अनुभूतियों को दृश्य रूप प्रदान करता है। कलमकार जिस विषय को हजारों शब्दों में व्यक्त करता है, चित्रकार उसी भाव को एक ही दृश्य में उकेर देता है। उदाहरणस्वरूप, ताजमहल के सौंदर्य, भव्यता और प्रभाव का वर्णन करने में लेखक को अनेक पृष्ठों की आवश्यकता पड़ सकती है, जबकि एक चित्रकार उसे एक चित्र में अभिव्यक्त कर देता है। तथापि, चित्र की अपनी सीमाएँ हैं। ताजमहल का चित्र देखकर यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि उसका निर्माण किसने, कब और किस उद्देश्य से कराया। इस प्रकार चित्र अनुभूति उत्पन्न करता है, जबकि लिपि तथ्यात्मक जानकारी प्रदान करती है।
मुद्रण और संचार कला में लिपि और चित्र एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान असीम और अनंत है; उसे पूर्णतः शब्दों में बाँधना संभव नहीं। शब्दों की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए चित्रों और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है। सभ्यता और संस्कृति के विकास में भाषा और लिपि के साथ-साथ चित्रण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
आधुनिक संचार-क्रांति के युग में भावाभिव्यक्ति के एक नए माध्यम के रूप में इमोजी (Emoji) का प्रचलन हुआ है। ‘इमोजी’ शब्द जापानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है—‘E’ और ‘Moji’। जापानी भाषा में ‘E’ का अर्थ ‘चित्र’ और ‘Moji’ का अर्थ ‘अक्षर’ या ‘चरित्र’ होता है। इस प्रकार इमोजी मूलतः चित्रात्मक संकेत हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की मुखाकृतियाँ और भाव- भंगिमाएँ सम्मिलित होती हैं। हिंदी में इन्हें ‘मुख-मुद्राएँ’ कहा जा सकता है।
मोबाइल और कंप्यूटर आधारित संचार में इमोजी के माध्यम से प्रेषक अपनी मनोदशा, भावना और प्रतिक्रिया को त्वरित रूप से प्राप्तकर्ता तक पहुँचा देता है। जिस भाव को व्यक्त करने में अनेक शब्दों और वाक्यों की आवश्यकता होती है, वही भाव एक इमोजी के माध्यम से संक्षेप में संप्रेषित हो जाता है। समयाभाव के इस युग में इमोजी संचार को सरल और त्वरित बनाते हैं।
हालाँकि, इमोजी की भी अपनी सीमाएँ हैं। ये संदर्भ-आधारित होते हैं और कभी-कभी अर्थ का भ्रम उत्पन्न कर सकते हैं। औपचारिक, अकादमिक या कानूनी संचार में इनका प्रयोग सीमित और सावधानीपूर्वक ही उपयुक्त माना जाता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि लिपि, चित्र और इमोजी—तीनों मानव संप्रेषण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के प्रतिनिधि माध्यम हैं। लिपि ज्ञान को स्थायित्व देती है, चित्र अनुभूति और प्रभाव उत्पन्न करता है तथा इमोजी तात्कालिक भावाभिव्यक्ति का सशक्त साधन है। आधुनिक संचार में इन तीनों का संतुलित और विवेकपूर्ण प्रयोग ही प्रभावी संवाद की वास्तविक कुंजी है।
