श्री देशना संग्रह
भारतीय काव्य परंपरा कितनी प्राचीन
31 जनवरी 2026
भारतीय काव्य परंपरा कितनी प्राचीन है इसका निर्णय करना मुश्किल है कहा जाता है कि प्रारम्भिक काव्य व्याकरण बद्ध नहीं थे पर वेदों में भी छन्दों को देखने मिलता है। रावण रचित छंद हम सब पढ़ते हैं।संभवतः किसी छन्दकार ने रावण की कथा लिखी और रावण के मुख से यह छंद कहला दिया तब से यह रावण द्वारा लिखा माना जाने लगा।
मेरे सर्वाधिक प्रिय तीन छन्दों का विवरण देना चाहूंगा।
सबसे पहला छंद है अनंग शेखर छंद, इस समूह में अनेक छंद हैं जो लघु गुरु के क्रम से लिखे हैं कुछ गुरु से प्रारंभ होते हैं कुछ लघु से । जैसे समयिका गुरु से प्रारंभ होता है प्रमाणिका लघु से, लघु गुरु की 4 वर्ण आवृति से प्रमाणिका 8 से पञ्चचामर और 16 से अनंग शेखर छंद बनता है। रावण रचित शिवतांडव स्त्रोत अनंग शेखर में है , आज के रैप सांग सुनिये लगता है इस छंद को सुन कर ही वे नकल करने कोशिश कर रहे हैं। इसका विधान है, 12121212121212 एक छंद देखते हैं
जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
दूसरा छंद है इंदिरा छंद , प्रसिद्ध गोपी गीत जो हर सनातन संस्कृति को मानने वालों के हृदय में बसा है जो श्रीमद भागवत महापुराण के दसवें स्कंध के 29 वे अध्याय में है, यह गीत प्रेम को अध्यात्म से जोड़ने की पराकाष्ठा है इसे व्यास जी ने लिखा है ऐसा बताया जाता है, इस छंद का विधान है नगण रगण रगण लघु गुरु, 111 212 212 12 चार चरण देखिये छंद को
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका-
स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥ १॥
तीसरा छंद है कनक मंजरी जिसमे प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी आदि शंकराचार्य ने लिखी है, भारत मे रहने वाले हर व्यक्ति ने इसे सराहा होगा। इसका विधान है 4 बार लघु फिर 6 बार भगण 211 अंत मे गुरु। कनकमंजरी छंद पढ़ने से इसकी लय स्वतः निर्मित हो जाती है 11112112112112112112112 , आईये देखिये छंद को,
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते
ये तीनों अलौकिक अद्भुत छन्द जनजन तक पहुंच असंख्य बार पढ़े गए हैं और सुने गए हैं। इन तीनो छंद का अनुवाद करने का प्रयास मैंने किया है, शिवतांडव का अनुवाद उसके मूल छंद पञ्चचामर में ही किया है, गोपी गीत अनुवाद उसके मूल छंद इंदिरा छंद में ही किया है। महिषासुर मर्दिनी का अनुवाद भी उसके मूल छंद कनक मंजरी में किया है। इन तीनो अनुवादित छन्दों की एक झलक देखिये कोइ त्रुटि हो तो बताईयेगा आपका आशीर्वाद अनिवार्य है।
1. शिव तांडव
जटा अरण्य मध्य बांध गंग के प्रवाह को
गले लगा कराल काल शेष सर्प दाह को
निनाद डम्म डम्म हो रहा प्रचंड वाद्य से
शिवा करे अनंग नृत्य ताण्डवा प्रमाद्य से
2. गोपी गीत
ऋषभ नाथ रक्षा करी सदा
विष बसे कभी नीर से यदा
मरण आ रहा था अघा रुपी
अलग काल दावानली झुकी
वृषभ दैत्य व्योमासुरा सभी
अनल दामिनी अन्धवायु भी
तृण असूर वर्षा धरा घटी
समय आ बचाया हमें तभी
3 महिषासुर मर्दिनी
जय गिरि नंदिनि विश्व विनोदिनि पूजत हर्षित नंदि भये
गिरिवर विंध्य निवास करे सुख दायक विष्णु प्रसन्न हुए
नमन करे सुर नायक शंकर पत्नि विशाल कुटुंब भरे
जय जय शैल सुता महिषासुर मर्दिनि घूघर केश धरे
सुरेश चौधरी
आशा है यह लेख पसंद आया होगा। सादर नमन
