श्री देशना संग्रह
देने का आनंद----;सीमित साधन ;असीम संतोष
31 जनवरी 2026
मेरी जीवन-यात्रा आज भी बाँटने और देने के कारण आनंद, संतोष और कृतज्ञता से परिपूर्ण है। जो यात्रा एक साधारण करियर और अल्प पूँजी से प्रारंभ हुई थी, वह आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुकी है। इसका मूल कारण केवल एक ही रहा-मेरा यह दृढ़ संकल्प कि मैं सीमाओं में रहकर जीवन जीऊँगा और आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करूँगा। इसी सिद्धांत ने मुझे यह सामर्थ्य दिया कि मैं अपने परिवार, रिश्तेदारों और मित्रों की सहायता कर सकूँ, वह भी बिना किसी उधार, विवाद या बकाया की स्थिति में उलझे। आज तक ईश्वर की कृपा से मेरे विरुद्ध किसी व्यक्ति, संस्था या कंपनी के साथ कोई मुकदमा अथवा वित्तीय विवाद नहीं रहा-यह मेरे लिए किसी भी संपत्ति से बड़ा सौभाग्य है।
समय के साथ हमारे परिवार के योगदान से अनेक ट्रस्टों की स्थापना हुई, जिनके माध्यम से सेवा के विविध आयाम विकसित होते चले गए। इनमें प्रमुख रूप से सिंघवी चैरिटेबल ट्रस्ट (27.11.1974), जड़ावबाई नथमल सिंघवी ट्रस्ट (14.02.1983), सुगाल एंड दमानी चैरिटेबल ट्रस्ट (07.05.1993), भगवान महावीर फाउंडेशन (22.04.1994), पीपल फॉर एनिमल्स चेन्नई चैरिटेबल ट्रस्ट (10.11.1998), विद्या ज्योति ट्रस्ट (01.04.2000), जैन्स इंडिया ट्रस्ट (03.11.2000) तथा एम्पैथी फाउंडेशन (28.05.2005) सम्मिलित हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, पशु-कल्याण और सामाजिक उत्थान के क्षेत्रों में निरंतर कार्य होता रहा है।
अपनी संपत्ति को सीमित रखने और अतिरिक्त को समाज के लिए समर्पित करने की भावना के कारण मुझे अनेक एनजीओ के साथ कार्य करने का अवसर मिला-कहीं कार्यकारी समिति सदस्य के रूप में, कहीं पदाधिकारी के रूप में और कहीं आजीवन सदस्य के रूप में। इस सहभागिता ने मुझे न केवल सेवा का व्यापक अनुभव दिया, बल्कि कई महान और प्रेरक व्यक्तित्वों से मिलने तथा जुड़ने का सौभाग्य भी प्रदान किया। इनमें श्री सी. सुब्रमण्यम (पूर्व वित्त एवं रक्षा मंत्री), भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एम. एन. वेंकटचलैया तथा तमिलनाडु एवं देश के अन्य अनेक विशिष्ट व्यक्तित्व सम्मिलित हैं।
मेरे इन विनम्र योगदानों के कारण मुझे भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और अनेक गणमान्य जनों के साथ मंच साझा करने का सम्मान भी मिला। मैं इसे अपनी उपलब्धि नहीं, बल्कि देने की भावना का प्रतिफल मानता हूँ।
इन सभी अनुभवों ने मेरे विश्वास को और दृढ़ किया है कि अधिक संपत्ति अधिक जटिलताएँ लेकर आती है, जबकि सादगी जीवन को सहज और सुखद बनाती है। भारतीय रेल के डिब्बों में लिखा वाक्य मुझे अक्सर प्रेरित करता है- “कम सामान, ज़्यादा आराम यात्रा को सुखद बनाता है।” यही सिद्धांत जीवन पर भी पूर्णतः लागू होता है -“कम संपत्ति, ज़्यादा आराम और जीवन-यात्रा आनंदमय।”
यदि इस पूरी यात्रा से कोई एक संदेश निकलता है, तो वह यही है कि देने से कभी कमी नहीं आती, बल्कि जीवन में अर्थ, उद्देश्य और शांति का विस्तार होता है। सीमाओं में रहकर, संतोष के साथ और करुणा से भरा जीवन ही वास्तव में समृद्ध जीवन है।
सुगाल चंद जैन, चेन्नई
