श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

हिन्दी मेरा अभिमान ( विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष )

10 जनवरी 2026

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अक्षर  अक्षर  को  रोली   बना   नित्य  लगाऊं  अपने भाल 

शब्दों  की  अत्युक्त  वीणा या  बजे  हंसध्वनि लय की ताल 

चतुरविश्लेषणी    बोली  या  त्रिधार  भाषा  का  ज्ञान  कहो

हिन्दी  सर्वोच्च शिखर  बैठी संस्कृत तनुजा  अभिमान कहो


निकली भारतेंदु कलम से  आचार्य शुक्ल ने  स्थापित किया

द्विवेदी  की   साधना   छायावाद  ने   इसे   श्रृंगारित  किया

चारण  बंधन  की  खोल  अर्गलायें   सुभद्रा  ने  मुक्त किया

हिमाद्रि  तुंग के उच्च शिखर  पर प्रसाद ने ध्वज युक्त किया


गति लय  अलंकार विभूषित  निराला की  हिन्दी  पूज्यनीय

पंत  महादेवी  के   पुष्प  से  सुरभित   भाषा  मेरी  महनीय

माखन की  अभिलाषा  हिन्दी  बनी   स्वाधीनता की भाषा

भाषाई   सौंदर्य   निबन्ध   लालित्य  राष्ट्रभाषा  की   आशा


दिनकर  ने  दिनकर  बन हिन्दी को  राष्ट्र में मान  दिलवाया

गुप्त  की  बात  क्या  कहूँ  पढ़  साकेत नैन अश्रु भर आया

मेरी  हिन्दी  कैसी  शापित   आधुनिकता  का   राज्य  हुआ

पढ़ना  त्याज्य  हुआ आंग्ल भाषा का  सर्वत्र साम्राज्य हुआ


कैसी  विद्रुपता  कैसा  भय  शुद्ध  हिन्दी अब  अभिशाप है 

कलम  जब   जब  मेरी लिखे प्रांजल हिन्दी बने  उपहास है

लच्छेदार   उर्दू   या   अंग्रेज़ी   अब  है  ज्ञान  का   मापदंड

बस  हिन्दी   दिवस  एक  बना लिया हमने करने को घमंड


ऐ  मेरी  मातृभाषा  जाग  हिन्द  वीर अटल से  सपूत जाग

विशेष  है   अभ्यंकर  का   देश  है  डमरू नाद प्रभूत जाग

धीर  है   वीर है   प्रवीर  है  कोदंड  प्रत्यंचा   की  टंकार  है

हिन्दी   तेरी  नीवं  में   ऋचाओं  के  स्वर   का  अहंकार है


सत्य   निष्ठ  संबंधों  का   दर्पण   है   भारत   भाषा  हिन्दी

साहित्य  कल्प  गौरव-गरिमा अर्पण है भारत भाषा  हिन्दी

सूर  कबीर  तुलसी  का  समर्पण  हैं  भारत  भाषा   हिन्दी

विचारक  हूँ  साधक  हूँ  धर्म तर्पण   है भारत भाषा हिन्दी


संधान है,  भारत  की शान  है, ज्ञान  है, विज्ञान  है  हिन्दी

छंद  है  निबंध  है, गीत  है,  हिन्द  का अभिमान  है हिन्दी

कलकल  झरनों  की  झंकार  वेद  सुरों  का गान  है हिन्दी

दिनकर,   गुप्त,  निराला,  प्रसाद  में   विद्यमान  है  हिन्दी


नमन   है,  वंदन  है, अवगुंठन  है  अभिव्यंजन   है  हिन्दी

गुरु  मनीषियों  की  साहित्यिक  विधा  का मंथन है हिन्दी

एक  सौ  चालीस  करोड़  जन  का  मैत्री  बंधन  है हिन्दी

सांस्कृतिक परिधा में मानसिकता का अनुकम्पन है हिन्दी

सुरेश चौधरी 

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