श्री देशना संग्रह
संविधानसभा' और 'गणतन्त्र' शब्द व्याकरण के अनुसार
26 जनवरी 2026
संविधानसभा :– यह संस्कृत-भाषा का शब्द है। शब्दविचार की दृष्टि से 'संविधानसभा' मे दो शब्दोँ का योग है :– पहला, 'संविधान' और दूसरा, 'सभा'। हम पहले 'संविधान' शब्द का बोध करेँगे। इस शब्द के पूर्व मे 'सं'/'सम्' उपसर्ग लगा है, जिसका अर्थ 'सम्यक् प्रकार से' है। इसका मूल शब्द 'विधान' है, जिसमे 'विशिष्ट' के अर्थ मे 'वि' उपसर्ग जुड़ा हुआ है। यह 'धा' धातु का शब्द है, जिसका अर्थ 'रखना' है। इसी धातु मे 'ल्युट्' प्रत्यय का योग होते ही 'अण' वा 'अन' की ध्वनि निर्गत होती है (निकलती है।)। इसप्रकार 'संविधान' शब्द का सर्जन ('सृजन' अशुद्ध शब्द है।) होता है। 'संविधान' शब्द की परिभाषा है :– उत्तम प्रकार से किये गये विधान वा व्यवस्था को 'संविधान' कहते हैँ; जैसे– भारत का संविधान मौलिक नहीँ है। 'मौलिक' का गठन (यहाँ 'निर्माण' का प्रयोग अशुद्ध है।) 'मूल' शब्द से हुआ है, जिसमे 'ठक्' प्रत्यय का योग है, जो 'इक' की ध्वनि उत्पन्न होते ही सुस्पष्ट हो जाता है। जैसे– भौगोलिक (भौगो 'लिक'– इक)।
अब इससे जुड़े दूसरे शब्द 'सभा' का बोध करते हैं। 'सभा' संस्कृत-भाषा का शब्द है। सभ्य (सभा के योग्य) व्यक्तियोँ का वह समूह है, जो किसी विषय पर विचार वा निर्णय करने के लिए गठित किया जाता है, 'सभा' कहलाता है।
हमे स्मरण करना चाहिए कि सिद्धान्तत: भारत देश अपने संविधान के अनुसार अनुशासित होता है, जिसे 'संविधानसभा'-द्वारा २६ नवम्बर, १९४९ ई० को ग्रहण किया गया था, जो २६ जनवरी, १९५० ई० को प्रवृत्त (लागू) हुआ था; क्रियान्वयन् किया गया था। यह अलग विषय है कि सिद्धान्त और व्यवहार मे पर्याप्त अन्तर दिख रहा है।
गणतन्त्र :– यह संस्कृत-भाषा का शब्द है, जिसमे दो शब्द प्रयुक्त हैँ :– 'गण' और 'तन्त्र'। यह शब्दभेद की दृष्टि से संज्ञा का शब्द है और लिंग-विचार से पुंल्लिंग। हम पहले 'गण' शब्द पर विचार करेँगे। 'गण' 'गिनना' के अर्थ मे 'गण्' धातु का शब्द है, जिसमे 'अच्' प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इसप्रकार 'गण' शब्द की रचना होती है। 'गण' का अर्थ समूह, जत्था, झुण्ड इत्यादिक है। जहाँ एक ही प्रकृति के शब्द दिखते हैँ वहाँ 'इत्यादिक' का प्रयोग किया जाता है, अन्यथा 'आदिक' का। 'गण' के भिन्नार्थक शब्द हैँ :– कोटि; चर; सेवक आदिक। यहाँ कोटि; चर; सेवक भिन्न प्रकार के शब्द हैँ, अत: 'आदिक' का प्रयोग किया गया है।
दूसरा शब्द 'तन्त्र' है, जोकि संस्कृत-भाषा का शब्द है। यह शब्दभेद के विचार से संज्ञा और लिंग-दृष्टि से पुंल्लिंग है। यह 'तन्' धातु का शब्द है, जिसका अर्थ 'विस्तार करना'/'तानना' है। 'तन्' मे 'तुन्' प्रत्यय के जुड़ते ही 'तन्त्र' का अस्तित्व उभरता है। 'तन्त्र' का अर्थ 'डोरा' और 'तन्तु' होता है। इसके भिन्नार्थक शब्द (भिन्न अर्थ) हैँ :– वस्त्र; कारण; युक्ति; कोटि; आनन्द; घर; कुल आदिक। इसप्रकार 'गणतन्त्र' का अर्थ हुआ, 'वह राजनीतिक प्रणाली, जिसमे शासकीय शक्ति जनता के हाथोँ मे निहित हो'।
२६ जनवरी, १९५० ईसवी ('इसवी', 'इस्वी' और 'ईस्वी' अशुद्ध हैँ।) को भारत मे 'संविधान' लागू किया गया था, इसीलिए देश मे प्रतिवर्ष छब्बीस जनवरी को 'गणतन्त्र-दिवस' का
आयोजन किया जाता है। गणतन्त्र देश वह कहलाता है, जहाँ की सत्ता वहाँ के नागरिक मे समाहित हो एवं जहाँ किसी विशेष राज्य का प्रमुख 'एक निर्वाचित व्यक्ति' हो। इसप्रकार भारत-संघ का प्रमुख वहाँ का राष्ट्रपति कहलाता है, जिसे 'देश का प्रथम नागरिक' भी कहा जाता है।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज;
