श्री देशना संग्रह
कुहरा शीत घना दिखे, कम्पन करते मेख
9 जनवरी 2026
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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
ठिठुरन ठिठकी ठण्ढ मे, टूट देह की जोड़।
माघ-पूस की शीत मे, धरती पड़े न गोड़१।।
दो–
हवा हवाई हाल है, ख़तरे मे मुसकान।
जीव-जगत् जड़ जोड़ता, जाड़े से हलकान।।
तीन–
जड़-चेतन हैँ काँपते, माँग रहे हैँ ताप।
ओझल दिखे अलाव हैँ, बुद्धि दिखे है पाप।।
चार–
पुरवइया सन्-सन् चले, ऋण मे ठण्ढी देख।
कुहरा शीत घना दिखे, कम्पन करते मेख।।२
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शब्दार्थ :– १ पैर (भोजपुरी- बोली) २बादल।
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