श्री देशना
───── ✦ ─────

श्री देशना संग्रह

“अनभिज्ञ”

आलेख31/1/20261 मिनट पढ़ने का समय


हर बात का हिसाब रखते हो,
फिर क्यों बेहिसाब से लगते हो।

हर एक से परिचय रखते हो,
फिर क्यों अपरिचित लगते हो।

हर ग़म को अपने पास रखते हो,
फिर क्यों ख़ुशमिज़ाज लगते हो।

हर राह की ख़बर रखते हो,
फिर क्यों राहगीर लगते हो।

हर बीमारी का इलाज रखते हो,
फिर क्यों बीमार लगते हो।

हर रिश्ते को सँभाल कर रखते हो,
फिर क्यों रिश्तों से दूर लगते हो।

हर क़दम को सँभल कर रखते हो,
फिर क्यों डरें हुए से लगते हो।

हर ज्ञान को दिमाग़ में रखते हो,
फिर क्यों अज्ञानी से लगते हो।

हर नदी को समुंदर में रखते हो,
फिर क्यों जल बिन मछली लगते हो।

हर पेड़-पौधे को जंगल में रखते हो,
फिर क्यों बिन पर्यावरण के लगते हो।

जगदीश कुमार धुर्वे
 इटारसी, मध्य प्रदेश
मोबाइल : 9407840107 ई-मेल : skj.dhurve88@gmail.com

टिप्पणियाँ