श्री देशना संग्रह
13 जनवरी 2026
देने का आनंद-सेवा से संस्कार तक की अविराम यात्रा
देने से मुझे जो अपार आनंद मिला, उसे शब्दों में बाँध पाना वास्तव में कठिन है। समाज ने मेरे परिवार को सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू किया और मुझे विविध क्षेत्रों के महान, संवेदनशील एवं प्रेरक व्यक्तित्वों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्हीं में मेरे मार्गदर्शक बने श्री पी. एम. चोरड़िया, जिन्होंने मुझे उन संस्थानों की ओर उन्मुख किया, जो निस्वार्थ भाव से समाज की सच्ची सेवा कर रहे थे।
उनकी पहली सलाह पर मैं कैंसर इंस्टीट्यूट, अड्यार पहुँचा। समय लेकर मैं डॉ. शांता से मिला। उन्होंने अत्यंत सरलता और आत्मीयता के साथ स्वयं पूरे संस्थान का भ्रमण कराया और उसके उद्देश्य को विस्तार से समझाया। उनका सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट और मानवीय था-किसी भी रोगी को केवल आर्थिक अभाव के कारण उपचार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
उस समय लगभग 20% रोगियों का उपचार पूर्णतः निःशुल्क तथा लगभग 25% का उपचार रियायती दरों पर किया जा रहा था। यह जानकर मन भीतर तक द्रवित हो उठा।
मैंने अपनी ओर से आर्थिक सहयोग की इच्छा प्रकट की और पूछा कि किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ। इस पर डॉ. शांता ने बड़े सहज भाव से कहा-
“श्रीमान जैन, मैं आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती। आपने स्वयं संस्थान देखने की इच्छा जताई, इसलिए सब कुछ दिखाया। अब आप स्वयं तय कीजिए कि आप क्या करना चाहते हैं।”
मैंने उन्हें बताया कि मैं ₹1 लाख का दान देना चाहता हूँ। इस पर उन्होंने स्नेहपूर्वक मुझे इसे बढ़ाकर ₹5 लाख करने के लिए प्रेरित किया, जो दो वर्षों में दिए जाने थे। मैंने सहर्ष सहमति दी। इस सहयोग के अंतर्गत निर्माणाधीन एक भवन का नाम मेरे माता-पिता के नाम पर “जडावबाई नथमल सिंघवी ऑन्कोलॉजी ब्लॉक” रखा गया।
यद्यपि राशि दो वर्षों में देने का वचन था, परंतु मात्र छह महीनों में ही पूरी राशि अदा कर दी गई। इस ब्लॉक का उद्घाटन भारत के तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री शंकरानंद द्वारा किया गया। उस अवसर पर मुझे उनके साथ मंच साझा करने का अवसर मिला। वह क्षण मेरे जीवन का अत्यंत गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय अनुभव था। इसे स्मरणीय बनाने हेतु मैंने अपने परिवार और कर्मचारियों के साथ कई चित्र भी खिंचवाए। यहीं से मेरी दान-सेवा की यात्रा ने सुदृढ़ गति पकड़ी-और उसी क्षण से यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ती चली गई। मुझे यह गहराई से समझ में आया कि दान केवल धन का हस्तांतरण नहीं, बल्कि संवेदना का विस्तार है।
जब देना आदत नहीं, संस्कार बन जाता है, तब जीवन स्वयं एक प्रेरणा बन जाता है। और जब सेवा का आनंद मिल जाए, तब लौटने का कोई मार्ग शेष नहीं रहता- केवल आगे बढ़ते रहने की साधना रह जाती है।
सुगालचंद जैन, चेन्नई
