श्री देशना संग्रह
ग़ज़ल
9 जनवरी 2026
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यही बेहद मुझे बस खल रहा है।
मेरे क़ातिल में तू शामिल रहा है।।
चली है झूठ की ऑंधी बहुत ही,
मगर सच का दिया तो जल रहा है।
सभी के ही सदा जो काम आए,
नये युग में तो वो पागल रहा है।
कभी मुझको कोई ग़म छू न पाया,
मेरे सर माॅं का तो ऑंचल रहा है।
सलीका सीख ले जीवन का इससे,
पुराना ये बहुत चावल रहा है।
बहुत समझाया था अवसर न खोना,
मगर अफ़सोस हाथ अब मल रहा है।
गिराने की उसे कोशिश बहुत की,
मगर वो तान सीना चल रहा है।
मेरे सीने में मानवता बसी है,
मेरी ऑंखों में गंगाजल रहा है।
करें सब याद तुझको इस तरह की,
मुसीबत का वही तो हल रहा है।
समय चुक जाए कब जाने कहाॅं पर,
ये जीवन है कि पल-पल गल रहा है।
जो था सबसे बड़ा हमदर्द मेरा,
विजय मेरा वही क़ातिल रहा है।
विजय तिवारी, अहमदाबाद
