श्री देशना संग्रह
वृंदावनलाल वर्मा जी की बर्षगाँठ(०९जनवरी१८८९,पर विशेष
9 जनवरी 2026
आज आदरणीय वृंदावनलाल वर्मा जी की बर्षगाँठ(०९जनवरी१८८९, मृत्यु:२३फरवरी१९६९)वृंदावनलाल वर्मा जी हिंदी के जाने-माने नाटककार तथा उपन्यासकार थे।वर्माजी का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊरानीपुर (झाँसी) नामक स्थान में 9 जनवरी सन् 1889 को हुआ। आपके पिता श्री अयोध्या प्रसाद जी झाँसी के तहसीलदार के कार्यालय में “रजिस्ट्रार कानूसगो' थे। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत ही आप “मुहिरर्र' का काम करने लगे। कुछ ही समय बाद आपके मन में वकील बनने की भावना जगी और मुहिरर्र के पद से त्यागपत्र देकर आगे की पढ़ाई के लिए आपने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में जाकर दाखिला' ले लिया। ग्वालियर से बी० ए० करने के उपरांत आगरा जाकर एल-एल० बी० की पढ़ाई प्रारंभ कर दी। कुछ दिन के लिए आपने 'मुफीद आम हाई स्कूल’ में तीस रुपए मासिक की नौकरी भी की तथा अध्यवसाय एवं लगन से एल० एल० बी० हो गए। सन् 1916 में आपने वकालत प्रारंभ की। वकालत की कम आमदनी से निराश होकर आपने काशी के बाबू गौरीशंकर प्रसाद की कृपा से नेपाल के राजगुरु को हिंदी पढ़ाने के लिए बाहर जाने का निश्चय किया, लेकिन पिता ने नहीं जाने दिया। वकालत में मन लगाया और, वकालत ऐसी चली कि मुकदमे दूसरों को भी देने पड़े।आपका हमारे घर आना होता रहता था।कई-कई दिन रहते थे व अपना लेखन कार्य भी करते थे।जब वो भोजन करते थे तो माँ एक -दो रोटी या अन्य कुछ हमसे भी परोसवाती थीं।जब भी जाते थे तो इकन्नी मुझे व मेरी दीदी को दे जाते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके आर्थिक हालात खराब हो गये थे।उनकी धर्मपत्नी आदरणीया चाची जी बराबर घर आती थीं।आदरणीया मम्मी व डैडी दोनों ही लोग अपनी-अपनी तरह से उनकी मदद करते थे।मैं बहुत छोटी थी माँ से पूछती थी कि चाची जी क्यों रो रहीं हैं?माँ कहतीं की चाचा जी को याद कर। हिंदी उपन्यास के विकास में आपका योगदान महत्त्वपूर्ण है। आपने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया है तो दूसरी तरफ हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया है।इतिहास,कला,पुरातत्व, मनोविज्ञान,मूर्तिकलाऔर चित्रकला में भी आपकी विशेष रुचि रही। 'अपनी कहानी' में आपने अपने संघर्षमय जीवन की गाथा बताई है।
