श्री देशना संग्रह
सरस्वती वंदना : कुछ दोहे
25 जनवरी 2026
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बख़्श कहन में बाँकपन, बख़्श क़लम में धार।
वीणापाणी छेड़ यूँ, मुझ वीणा के तार।।
बनूँ निराला शारदे, रचूँ सूर्य-सा कांत।
मथूं दृष्टि औ' बोध से, हिय का सिंधु अशांत।।
जीवन की लय में रहूँ, साधूँ हर सुर-छंद।
बेशक शूलों से घिरूँ, बाँटूँ मगर सुगंध।।
शास्त्र-शस्त्र औ' अस्त्र का, देना सम्यक ज्ञान।
ताकि बचा कर रख सकूँ, हर विधि अपनी आन।।
सुख हो या दुख हो मगर, खोऊँ नहीं विवेक।
कैसा भी हो वक़्त माँ, रखना मेरी टेक।।
- नरेश शांडिल्य
