श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

'वसंत की आहट'

23 जनवरी 2026

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आई फिर से एक नई भोर l


निशा के आँचल को समेट 

खुद को किरणों में लपेट

क्षितिज पार फैली अरुणाई 

बहने लगी पवन बौराई 

कोहरे का आवरण हटा 

सूरज ने खोले नयन कोर


आई फिर से एक नई भोर l


नीड़ में दुबके बैठे आकुल

भोर हुई तो चहके खगकुल

खुले झरोखे हवा की सनसन

आकर तन में भरती सिहरन 

लाया प्रभात संदेश नवल 

नव उमंग मन में हलचल 

कमल सरोवर पर अलि-राग

काँव-काँव कहीं करते काग 

हर्ष से तरु-पल्लव विभोर 


आई फिर से एक नई भोर l


त्यौहार मनाते हैं हिलमिल  

खाते गजक और गुड़-तिल 

हृदय हैं सबके मगन-मगन 

खुशबू उड़ती है घर-आँगन  

धरा का भरता नवल कलस

अमतृ लगता गन्ने का रस

तुहिन कणों से भरे अधर

आहट वसंत की चौखट पर 

कृषकों के मन लेते हिलोर


आई फिर से एक नई भोर l


है नील गगन पर रंग छाया 

मौसम पतंग का फिर आया 

वह उड़तीं फरफर रुमालों सी 

मंझा लिपटी है बालों सी 

झूम-झूम, लहरा, इठला कर 

जीत-हार की होड़ लगा कर 

उड़ती रहती हैं वे नभ पर 

गिरती रहती हैं कट-कट कर 

छत-मुंडेर हर जगह शोर


आई फिर से एक नई भोर।


निशा के आँचल को समेट 

खुद को किरणों में लपेट

क्षितिज पार फैली अरुणाई 

बहने लगी पवन बौराई 

कोहरे का आवरण हटा 

सूरज ने खोले नयन कोर


आई फिर से एक नई भोर l


-शन्नो अग्रवाल

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