श्री देशना संग्रह
वाणी स्तवन
18 जनवरी 2026
सुर पूजिता हो अंब, वेद वंदिता हे मातु,
विद्या दायिनी हो मातु, भक्ति भाव सार दे।
वरदायिनी हो अंब,मधुर हासिनी हो माँ,
स्वर साधिनी हे मातु, शब्द को निखार दे।।
वीणा वादिनी हो अंब, हंस वाहिनी हो तुम्ही,
मृदु भाषिनी हो निज, पाणि माँ पसार दे।
कमलासिनी हो अंब,शब्द साधिनी हो दिव्य,
तिमिर नाशिनी हो माँ, अंधकार टार दे।।
वागेश्वरी हो मइया ,विमलेश्वरी तुम्ही हो,
देवी सरस्वती अंब,काव्य को श्रृंगार दे।
भुवनेश्वरी हे देवी,सुनना पुकार मेरी,
ताल छंद गीत लय, वीणा की झंकार दे।।
सिद्धि दायनि वाग्देवि,मातु भारती तुम्ही हो,
जग वंदिता भवानी ,काव्य को उद्गार दे।
राह सूझती नहीं है, देवी वरप्रदा सुनो,
विनती यही है मातु, तम से उबार दे।।
वीणा वादिनी हो अंब, वरदायिनी हो सौम्य,
श्वेत वसना हो मम, ज्ञान दे मांँ शारदे।
शंख धारिणी हो अंब,बुद्धि दायिनी हो शुद्ध,
शुभ्र मंगला हो मम, लेखनी को धार दे।।
जगत जननी अंब,ममता की शुचि मूर्ति,
तनुजा हूंँ तेरी मातु, मुझको दुलार दे।
लेकर शब्दों का हार,गीता आई तेरे द्वार,
पुनीत भावना भर,कृपा दृष्टि डार दे।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
संपादक जनक नंदिनी
रायबरेली उत्तर प्रदेश

