श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

कोहरे की सफ़ेद चादर

22 जनवरी 2026

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 कोहरे की सफ़ेद चादर ओढ़े

कंपकंपाती सर्दियों की सुबह,

ठहरी हुई-सी, खोई हुई-सी

अपने सूरज के इंतज़ार में

आँखें टिकाए खड़ी थी…


सूरज को भी पता था

कि सुबह उसकी राह देख रही है।

उसने

धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा

सुबह की हथेलियों पर रख दिया

और धीमे से कहा,

“तुम बहुत हसीन हो…”

शर्म से पलकें झुकाए

सुबह ने मन ही मन मुस्कुराकर कहा,

“तुमसे ही तो हूँ मैं रौशन,

तुम बिन मेरा क्या है जीवन?

मेरी हर शुरुआत

तुम्हारे होने से ही मुकम्मल है…”


सूरज ने प्यार भरी मुस्कान के साथ

सुबह को शुभकामनाएँ दीं

और अपने सिंहासन की ओर बढ़ चला…


सुबह ने

धूप के उस टुकड़े को

अपने आँचल में बाँध लिया

और भरोसे के साथ

निकल पड़ी

दिन के लंबे सफ़र पर

क्योंकि उसे यक़ीन था

सूरज की रौशनी

हर दिन, हर पल

उसके साथ है…


कविता राजपूत 


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