श्री देशना
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आधुनिकता और परंपरा का अनुपम संगम — णमोकार तीर्थ

21 जनवरी 2026

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डा ममता जैन, पुणे 

जैन धर्म में तीर्थ की अवधारणा केवल किसी पवित्र स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक उत्थान, सामाजिक शुद्धि और धर्म-संस्कारों के संरक्षण की एक समग्र व्यवस्था है। जैन दर्शन के अनुसार तीर्थ वह माध्यम है, जो जीव को संसार-सागर से पार कर मोक्ष-पथ की ओर अग्रसर करता है।

‘तीर्थ’ शब्द का आशय है—पार उतरने का साधन। जैन परंपरा में तीर्थ का संबंध सीधे तीर्थंकर से जुड़ा है, जिन्होंने स्वयं संसार रूपी  भव सागर से पार होकर दूसरों के लिए मोक्ष मार्ग प्रशस्त किया।

जैन धर्म में तीर्थ का सर्वप्रथम और सर्वोच्च महत्व आध्यात्मिक साधना से जुड़ा है। तीर्थ स्थल

आत्मसंयम और तप की प्रेरणा देते हैं,

राग-द्वेष से निवृत्ति का मार्ग दिखाते हैं,

और मोक्ष के लक्ष्य को सजीव बनाते हैं।

तीर्थों में होने वाले दर्शन, स्वाध्याय, प्रवचन, व्रत-अनुष्ठान और पर्व-उत्सव साधक को आत्मशुद्धि की ओर प्रेरित करते हैं। यहाँ व्यक्ति बाह्य आडंबर से हटकर अंतरंग साधना की ओर उन्मुख होता है। इस दृष्टि से णमोकार तीर्थ की संकल्पना सारस्वत आचार्य देवानंदी जी की दूरदर्शी सोच का परिणाम है। तीर्थ का प्रत्येक चरण सुनियोजित, शास्त्रसम्मत रूप से आगे बढ़ रहा है। मात्र आस्था नहीं वैज्ञानिक , तार्किक  से आधुनिक युवा पीढ़ी, शोधार्थी, जिज्ञासु और साधक—सभी के लिए यह तीर्थ एक जीवंत विश्वविद्यालय के समान होगा जहां आगम दर्शन शब्दों से नहीं, अनुभव से सिखाया जाएगा।

यहां आधुनिक तकनीक का प्रयोग से  धर्म के मर्म को जन-जन तक पहुंचाने के साधन के रूप में किया गया है। जैन दर्शन के सूक्ष्म सिद्धांत—अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि—इन सभी को समकालीन भाषा और तकनीकी माध्यमों से इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि वे आज के मानव के जीवन से सीधे जुड़ते हैं।

णमोकार तीर्थ की मूल अवधारणा यह है कि   विश्व भर में मात्र जैन शास्त्रों में उल्लखित समवसरण केवल इतिहास या ग्रंथों में सीमित न रहकर, आज के मानव के लिए भी बोधगम्य बने। यहां समवसरण की परिकल्पना को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मूर्त रूप दिया गया है, जहां श्रद्धा और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। ऑडियो-विज़ुअल माध्यमों, डिजिटल प्रस्तुतीकरण और संरचनात्मक प्रतीकों के द्वारा जैन आगम सिद्धांतों को सहज, सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाएगा।

इस तीर्थ की सबसे विशिष्ट और ऐतिहासिक विशेषता यह है कि यहाँ समस्त निर्माण एवं शिल्प कार्य संगमरमर पर किया जा रहा है। प्रत्येक दीवार, स्तंभ और संरचना पर जैन आगमों का सार सूक्ष्म नक्काशी के माध्यम से उकेरा गया है। यह नक्काशी केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि मौन उपदेश है—जो दर्शक को आत्मचिंतन और साधना की ओर प्रेरित करता है।

आगंतुक जब इन दीवारों के बीच से गुजरता है, तो वह केवल देखता नहीं—वह समझता है, अनुभव करता है और आत्मचिंतन की ओर अग्रसर होता है।संगमरमर की स्थायित्वपूर्ण शिल्प-संस्कृति इस तीर्थ को दीर्घकालिक आध्यात्मिक धरोहर के रूप में स्थापित करती है।

उन्हीं के मार्गदर्शन में मुनि युगल श्री अमोघकीर्ति जी एवं श्री अमरकीर्ति जी सहित समस्त संघ की पावन उपस्थिति में आगामी पंचकल्याणक महोत्सव की समस्त व्यवस्थाएँ अत्यंत सुव्यवस्थित, अनुशासित एवं सुचारु रूप से संपन्न की जा रही हैं।

णमोकार तीर्थ की धार्मिक भव्यता का एक विशेष आयाम है यहाँ स्थित श्री चंद्रप्रभु भगवान की 32 फीट ऊँची परिकरयुक्त प्रतिमा, जो यक्ष-यक्षिणी, अष्टमंगल, अष्टप्रतिहार्य और सभी 24 तीर्थंकरों के साथ एक समग्र दिव्य स्वरूप को दर्शाती है। यह केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि तीर्थंकर परंपरा का मूर्तिकाय प्रतीक है। इस परिसर की एक और अद्वितीय कृति है पार्श्वनाथ भगवान की सहस्त्रफणी प्रतिमा, जिसमें जलधारा केवल एक बिंदु पर डालने से वह स्वयं ही 1008 फणों से अभिषेक रूप में प्रवाहित होती है—यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए एक चमत्कारी और भावविभोर कर देने वाला अनुभव होता है। तीर्थ के चारों दिशाओं में मानव स्तंभ (मानस्तंभ) स्थापित किए गए हैं, जिनमें प्रत्येक पर 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित की जा रही हैं—ये स्तंभ आत्मनमन और अहंविनय का प्रतीक हैं। पूरे तीर्थ परिसर में समवसरण के अनुरूप चैत्यभूमि, सभा मंडप, ध्यान क्षेत्र तथा अन्य सभी आवश्यक धर्मिक संरचनाएँ इस प्रकार निर्मित की गई हैं कि वे एक जीवंत आगमिक संसार का अनुभव कराती हैं। यहाँ भविष्य में हजारों जिन प्रतिमाओं का एक साथ पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित किया जाना प्रस्तावित है, जो तीर्थ के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को और अधिक उन्नत करेगा।

इस प्रकार णमोकार तीर्थ केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि परंपरा की जड़ों से जुड़ा हुआ आधुनिक चिंतन केंद्र है। यह स्थान यह संदेश देता है कि धर्म जड़ नहीं होता—वह समय के साथ संवाद करता है, और जब यह संवाद परंपरा की मर्यादा और आधुनिकता की समझ के साथ होता है, तब णमोकार तीर्थ जैसे दिव्य सृजन का जन्म होता है।लगभग 55 एकड़ भूखंड पर मानो साक्षात् समोशरण उतर आया हो 

अधभुत रचना हे , आचार्य श्री की आगम युक्त परिकल्पना साकार हो गई हे 

तीर्थ पर सभी आगंतुक  यात्रीयो की सुविधा का पूर्ण ध्यान रखते हुए , चाहे वो साधु हो, त्यागी ब्रती हो, श्रावक हो           गुरु मंदिर, त्यागी भवन , 200 सर्वसुविधा युक्त कमरे, भोजनशाला, साधुओ के लिये आहार भवन, बच्चों के झूले,  योग क्रिया के यन्त्र का निर्माण हो चुका है । यह क्षेत्र मनमाड़ से 38 की.मी. नाशिक से 60 की.मी. इन्दौर से 365 किलोमीटर है 

निश्चय ही, णमोकार तीर्थ आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रेरणा बनेगा कि आस्था और बुद्धि, भक्ति और विवेक—एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री होगे। बस यही कामना है णमोकार तीर्थ—एक ऐसा तीर्थ बने जो केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि अनुभूति, अध्ययन और आत्मबोध का अनूठा केंद्र  बनकर विश्व भरमें अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त करे इन्ही मंगल भावनाओं के साथ ...

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