श्री देशना संग्रह
मुसाफिर चल तुझे है दूर जाना
हरीश चंद शर्मा हरि गीतकार
पंच तत्वों से भरा लुटने,
लगा है ये खजाना।
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे है दूर जाना।।
देखते जिससे जहांँ को,
रोशनी गुम हो गई है,
चेतना मन की ना जाने,
कहांँ जाकर सो गई है,
मंद भी पड़ने लगा उस,
सांँस का आना औ जाना,
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे है दूर जाना।।1।।
सुन नहीं पाते मधुर स्वर,
कर्ण पट पर लगे ताले,
स्वाद भी ग़ायब हुआ है,
हो गये रसना में छाले,
बंद होने लग गया अब,
नासिका में गंध आना,
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे है दूर जाना।।2।।
शिथिल हैं सब अंग तेरे,
त्वचा भी ढीली हुई है,
कोई सुनता नहीं मन की,
आँख भी गीली हुई है,
कंठ से निकले नहीं अब,
कोई भी मीठा तराना,
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे है दूर जाना।।3।।
कंँप कंँपाते हाथ अब ये,
पाँव सत नहीं झेलते हैं,
जीभ भी नठरा रही हम,
जिंदगी को ठेलते हैं,
याद नहीं रहता है भूले,
लोगों से मिलना मिलाना,
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे है दूर जाना।।4।।
मोह और माया के पीछे,
व्यर्थ काया को गंँवाया,
है नहीं अब पास जिनको,
जिंदगी भर है कमाया,
भूले हैं यौवन के मद में,
ईश का आसन लगाना,
मोह तजकर के मुसाफिर,
चल तुझे अब दूर जाना।।5।।
हरीश चंद शर्मा हरि गीतकार


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