श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

ग़ज़ल

डॉ. रामावतार सागर

कविता23/8/20261 मिनट पढ़ने का समय

ग़ज़ल

यूं लग रहा है जैसे कि सहरा उदास है

गिनती की बारिशें और बरसों की प्यास है

गर्मी में सूखता नहीं क्यों आज ये शज़र

लगता है इक नदी सी कोई आस पास है

कोई जुड़ाव उनसे क्यों लगता है आज भी

इक शख़्स दूरियों में भी जो इतना ख़ास है

उन दूरियों ने भी हमें कितना रखा है पास

इन नजदीकियों में लगा कितनी खटास है

भूला भी जा रहा नहीं मिलता भी है नहीं

ये प्यार है या कोई ये झूठा कयास है

पूछा नहीं है आज तक उसने मेरा पता

जो शख़्स मुद्दतों से मेरे दिल के पास है

सागर तुम्हीं बताओ के कश्ती का सच है क्या

बस वो ही तैरती है जो लहरों की ख़ास है

डॉ. रामावतार सागर

कोटा राजस्थान

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