श्री देशना
───── ✦ ─────

श्री देशना संग्रह

सावन की फ़ुहार

बृजेन्द्र सिंह झाला "पुखराज"

कविता22/8/20261 मिनट पढ़ने का समय

झिरमिर झिरमिर बरखा रानी,

सावन का एक गीत बने ।

पुरवैया के झोंके,

सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।

करें श्रृंगार धरा का पावस,

सुधा उँड़ेले वो हर पल ।

हरित वसन धारें वसुधा,

हो रही बयारों में हलचल ।।

घड़घड़ाहट मेघ की गर्ज़न,

देव-सृजन में ढाती ग़ज़ब ।

सिंह लजाती-जहाँ सजाती,

कैसा करिश्मा ख़ूब अज़ब ।।

दादुर-मोर-पपीहा,

अपनी क्रीड़ा से हरते पीड़ा ।

सौंप दिया विधि ने उनको,

जन-मन खुश करने का बीड़ा ।।

उठे फुहारें-पड़े हिण्डोले,

गुंजित ललनाओं का गान ।

कोकिल-कण्ठ-ध्वनि जिनकी,

जैसे सारद की वीणा-तान ।।

मात प्रकृति के अंक में देखो,

करे पवन अठखेलियाँ ।

वन-विहार को हर इक टोली,

मना रही रंगरेलियाँ ।।

नव-विवाहित युग़्मों में जो,

केन्द्र बने आकर्षण का ।

हँसी-ठिठोली-किलकारी का,

संगम है उत्कर्षण का ।।

छटा मनोरम ईश की अंकित,

मानस-पटल पर प्रीत बने ।

पुरवैया के झोंके,

सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।

झिरमिर झिरमिर बरखा रानी,

सावन का एक गीत बने ।

पुरवैया के झोंके,

सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।

बृजेन्द्र सिंह झाला"पुखराज",

कोटा (राजस्थान)

टिप्पणियाँ