श्री देशना संग्रह
सावन की फ़ुहार
बृजेन्द्र सिंह झाला "पुखराज"
झिरमिर झिरमिर बरखा रानी,
सावन का एक गीत बने ।
पुरवैया के झोंके,
सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।
करें श्रृंगार धरा का पावस,
सुधा उँड़ेले वो हर पल ।
हरित वसन धारें वसुधा,
हो रही बयारों में हलचल ।।
घड़घड़ाहट मेघ की गर्ज़न,
देव-सृजन में ढाती ग़ज़ब ।
सिंह लजाती-जहाँ सजाती,
कैसा करिश्मा ख़ूब अज़ब ।।
दादुर-मोर-पपीहा,
अपनी क्रीड़ा से हरते पीड़ा ।
सौंप दिया विधि ने उनको,
जन-मन खुश करने का बीड़ा ।।
उठे फुहारें-पड़े हिण्डोले,
गुंजित ललनाओं का गान ।
कोकिल-कण्ठ-ध्वनि जिनकी,
जैसे सारद की वीणा-तान ।।
मात प्रकृति के अंक में देखो,
करे पवन अठखेलियाँ ।
वन-विहार को हर इक टोली,
मना रही रंगरेलियाँ ।।
नव-विवाहित युग़्मों में जो,
केन्द्र बने आकर्षण का ।
हँसी-ठिठोली-किलकारी का,
संगम है उत्कर्षण का ।।
छटा मनोरम ईश की अंकित,
मानस-पटल पर प्रीत बने ।
पुरवैया के झोंके,
सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।
झिरमिर झिरमिर बरखा रानी,
सावन का एक गीत बने ।
पुरवैया के झोंके,
सरगम सा सुरमय संगीत बने ।।
बृजेन्द्र सिंह झाला"पुखराज",
कोटा (राजस्थान)

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