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श्री देशना संग्रह

धाराशिव लेणी क्रमांक 3 — सर्वेक्षण रिपोर्ट

सुनील कुमार जैन (समीर)

आलेख22/8/20267 मिनट पढ़ने का समय

1.

स्थान एवं प्रवेश

धाराशिव लेणी परिसर में मुख्य सड़क से सीढ़ियों द्वारा नीचे उतरने के बाद दाहिनी ओर लेणी क्रमांक 3 स्थित है। लेणी के बाहरी प्रवेश पर एक गेट बना हुआ है, किंतु वर्तमान में उसमें दरवाजा नहीं है। प्रवेश द्वार के बाईं ओर एक अस्पष्ट एवं खंडित आकृति दिखाई देती है, जबकि दाईं ओर केवल आकृति के अवशेष दिखाई देते हैं। (चित्र 1) प्रवेश के आगे सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर मुख्य प्रवेश क्षेत्र में पहुँचा जाता है। मुख्य प्रवेश के दाहिनी ओर एक सेल/कक्ष है, जिसकी शैल-कटाई (कोरणी) अपेक्षाकृत अच्छी दिखाई देती है, हालांकि यह भाग भी खंडित अवस्था में है। (चित्र 2) मुख्य प्रवेश के बाईं ओर भी एक सेल है, जो वर्तमान में खंडित अवस्था में है।

2.

आंतरिक संरचना

लेणी के अंदर अनेक सेल/कक्ष बने हुए हैं। निरीक्षण के दौरान बाईं ओर लगभग 8, दाईं ओर लगभग 8 तथा सामने की दिशा में लगभग 7 सेल दिखाई दिए। इस प्रकार उपलब्ध संरचना में कुल लगभग 23 सेल स्पष्ट रूप से पहचाने जा सके। मुख्य सेल के सामने बने सभागृह/हाल के मध्य भाग में लगभग 12 पिलर दिखाई देते हैं। इनमें कुछ पिलर प्राचीन प्रतीत होते हैं, जबकि अनेक पिलरों पर बाद में जीर्णोद्धार अथवा मरम्मत के संकेत दिखाई देते हैं। दीवारों पर प्लास्टर भी किया गया है। सेलों के सामने तथा लेणी के आंतरिक भाग में चारों ओर लगभग 16 पिलर बने हुए हैं।

3.

बाईं ओर के सेल एवं जैन प्रतिमाएँ

बाईं ओर से सेल का निरीक्षण प्रारंभ करने पर दूसरी सेल के निकट फर्श पर एक चौमुखी पाषाण पिलर गिरा हुआ दिखाई देता है। इसके चारों ओर जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं के उत्कीर्ण अवशेष दिखाई देते हैं। एक दिशा में खंडगासन अवस्था में जैन तीर्थंकर की प्रतिमा दिखाई देती है, जबकि दूसरी दिशा में भी तीर्थंकर की आकृति दिखाई देती है। एक अन्य दिशा में पद्मासन अवस्था की प्रतिमा दिखाई देती है। इसकी स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह किसी प्राचीन मंदिर के पिलर का अवशेष हो सकता है। (चित्र 3) इसी क्षेत्र के पास बने एक सेल में सामान/बैग के ढेर के बीच एक और चौमुखी पाषाण पिलर दिखाई देता है। इस पिलर पर भी खंडगासन जैन तीर्थंकर की प्रतिमा उत्कीर्ण है। (चित्र 4) इसके पास एक छोटा पिलर भी दिखाई देता है, जिस पर तीर्थंकर के पैरों के नीचे का भाग अथवा प्रतिमा का निचला अवशेष दिखाई देता है।

4.

सामने की दीवार एवं तीर्थंकर प्रतिमा

सामने की दीवार के बाईं ओर से गिनने पर लगभग नौवें सेल में एक महत्वपूर्ण जैन प्रतिमा दिखाई देती है। प्रतिमा पद्मासन ध्यान मुद्रा में है। सिर के ऊपर छत्र तथा दोनों ओर सेवक/चामरधारी आकृतियाँ दिखाई देती हैं। प्रतिमा की छाती पर श्रीवत्स चिह्न दिखाई देता है। प्रतिमा का रंग काला है और वर्तमान में यह खंडित अवस्था में प्रतीत होती है। लेणी के अंदर प्रकाश कम होने के कारण प्रतिमा के अनेक सूक्ष्म विवरण स्पष्ट दिखाई नहीं देते। प्रतिमा के परिकर के निचले भाग में संभवतः यक्ष-यक्षिणी तथा सेवक-सेविका की आकृतियाँ हो सकती हैं; हालांकि अंधकार एवं प्रतिमा की वर्तमान स्थिति के कारण इसकी निश्चित पहचान के लिए अधिक स्पष्ट छायाचित्र अथवा प्रत्यक्ष विशेषज्ञ अध्ययन आवश्यक है। परिकर के ऊपरी भाग में पंचतीर्थी स्वरूप की संरचना दिखाई देती है, जिसमें दो पद्मासन एवं दो खंडगासन प्रतिमाओं के साथ मध्य में एक पद्मासन प्रतिमा दिखाई देती है। (चित्र 5)

5.

दसवीं सेल के निकट आकृतियाँ

लगभग दसवें सेल के बाईं ओर नाग की आकृति तथा उसका मुख दिखाई देता है। यह आकृति वर्तमान स्थिति में पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है। सामने की दीवार पर एक अन्य आकृति/प्रतिमा दिखाई देती है। यह संभवतः परिसर के किसी अधिष्ठायक देव से संबंधित हो सकती है, लेकिन वर्तमान अवस्था में निश्चित पहचान संभव नहीं है। (चित्र 6)

धाराशिव

लेणी क्रमांक 3 — सर्वेक्षण रिपोर्ट

6.

ग्यारहवीं सेल की प्रतिमा

लगभग ग्यारहवें सेल में काले रंग की एक खंडगासन प्रतिमा दिखाई देती है। प्रतिमा का मुख थोड़ा झुका हुआ है तथा सिर पर बालों जैसी आकृति दिखाई देती है। प्रतिमा के सिर के ऊपर त्रिछत्र विद्यमान है और सिर के पीछे भामंडल दिखाई देता है। बाईं ओर का हाथ एवं पैर खंडित हो चुके हैं। प्रतिमा पर वर्तमान में काला विलेपन स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। प्रतिमा की निर्माण सामग्री सामान्य पाषाण प्रतिमा जैसी स्पष्ट नहीं दिखाई देती तथा यह संभवतः मिट्टी अथवा किसी अन्य सामग्री से निर्मित हो सकती है। इसकी वास्तविक सामग्री की पुष्टि विशेषज्ञ परीक्षण के बाद ही की जानी चाहिए। (चित्र 7)

7.

चौमुखी पिलर

इसी क्षेत्र के पास एक चौमुखी पाषाण पिलर पड़ा हुआ है। उसके विभिन्न भागों पर खंडगासन तीर्थंकर प्रतिमाओं के अवशेष दिखाई देते हैं। पिलर की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह किसी प्राचीन संरचना अथवा मंदिर के स्थापत्य अवशेष का महत्वपूर्ण प्रमाण हो सकता है। (चित्र 8)

8.

बारहवीं सेल — पार्श्वनाथ प्रतिमा

लगभग बारहवीं सेल पर लोहे का दरवाजा लगा हुआ है। इस सेल के अंदर भगवान पार्श्वनाथ की काले रंग की पद्मासन प्रतिमा दिखाई देती है। प्रतिमा सिंहासन पर विराजमान है। प्रतिमा के दोनों ओर मकर आकृतियाँ तथा चामरधारी सेवकों की आकृतियाँ दिखाई देती हैं। भगवान के सिर के ऊपर सात फण वाला नाग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। प्रतिमा के परिकर एवं स्थापत्य सज्जा को देखते हुए यह लेणी की महत्वपूर्ण जैन प्रतिमाओं में से एक प्रतीत होती है। (चित्र 9) अन्य कई सेल वर्तमान में खाली दिखाई देते हैं।

9.

चौदहवीं सेल के सामने का पिलर

लगभग चौदहवीं सेल के सामने स्थित एक पिलर अपेक्षाकृत प्राचीन दिखाई देता है। इसके ऊपरी भाग में चक्रनुमा स्थापत्य तत्व दिखाई देता है। वर्तमान में इस भाग पर प्लास्टर किया गया है, जिससे मूल आकृति एवं निर्माण-विवरण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। (चित्र 10)

10.

जल रिसाव एवं वर्तमान स्थिति

लेणी के अंदर कुछ स्थानों पर पानी का रिसाव दिखाई देता है। इससे भविष्य में शैल-सतह, उत्कीर्णन एवं प्रतिमाओं को नुकसान होने की संभावना है। लेणी में सफाई का कार्य किया गया है, जिससे आंतरिक भाग अपेक्षाकृत साफ दिखाई देता है। हालांकि प्रतिमाओं, पिलरों तथा प्राचीन शैल-सतह की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता है।

11.

बाहरी प्रवेश के ऊपर तीर्थंकर आकृति

लेणी से बाहर निकलते समय मुख्य गेट के ऊपर एक तीर्थंकर प्रतिमा/आकृति दिखाई देती है। प्रतिमा वर्तमान में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती, किंतु यह लेणी के बाहरी स्थापत्य एवं धार्मिक स्वरूप के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। (चित्र 11)

12.

बाहरी परिसर एवं जलकुंड

लेणी के बाहरी स्वरूप को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इसके निर्माणकाल में यह एक भव्य एवं स्वतंत्र धार्मिक परिसर का हिस्सा रही होगी। लेणी के सामने पर्याप्त खुला स्थान है। लेणी के बाईं ओर एक प्राचीन जलकुंड/पानी की संरचना भी दिखाई देती है। यह जल-व्यवस्था लेणी परिसर के प्राचीन उपयोग एवं यहां रहने वाले साधु-साध्वियों अथवा आने वाले श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं से संबंधित हो सकती है। इसके संबंध में विस्तृत पुरातात्त्विक अध्ययन आवश्यक है। (चित्र 12)

13.

प्रारंभिक निष्कर्ष

धाराशिव लेणी क्रमांक 3 के सर्वेक्षण में जैन धर्म से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण स्थापत्य एवं मूर्तिकला अवशेष दिखाई दिए। इनमें चौमुखी पाषाण पिलरों पर उत्कीर्ण तीर्थंकर प्रतिमाएँ, पद्मासन एवं खंडगासन प्रतिमाएँ, पार्श्वनाथ की सात फण वाली प्रतिमा, परिकरयुक्त तीर्थंकर प्रतिमा, नाग आकृति तथा अन्य अस्पष्ट धार्मिक आकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। लेणी के पिलरों और प्रतिमाओं में कुछ अवशेष अत्यंत प्राचीन प्रतीत होते हैं, जबकि कई स्थानों पर बाद के जीर्णोद्धार, प्लास्टर एवं मरम्मत के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। इसलिए लेणी के मूल निर्माणकाल, बाद के परिवर्तन तथा इसके जैन धार्मिक उपयोग के क्रम को निर्धारित करने के लिए विस्तृत पुरातात्त्विक, स्थापत्य एवं मूर्तिशास्त्रीय अध्ययन आवश्यक है। विशेष रूप से चौमुखी पिलरों पर उत्कीर्ण तीर्थंकर प्रतिमाएँ और पार्श्वनाथ की प्रतिमा इस लेणी के जैन संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण हो सकती हैं। जल रिसाव, प्लास्टर, खंडित प्रतिमाएँ तथा असुरक्षित स्थापत्य अवशेषों को देखते हुए इस स्थल का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, उच्च-रिजॉल्यूशन फोटोग्राफी, 3D रिकॉर्डिंग तथा संरक्षण विशेषज्ञों द्वारा निरीक्षण किया जाना उपयोगी होगा।

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