श्री देशना संग्रह
।।विश्वास का संकट : आधुनिकता के बीच बिखरते रिश्ते
सुगालचन्द जैन,
हाल ही में चेन्नई संस्करण के एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार का शीर्षक था- "शक का कारोबार : गिरता हुआ आपसी विश्वास।" समाचार में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार 54 प्रतिशत महिलाएँ अपने पतियों की जासूसी करवा रही हैं, जबकि 46 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नियों पर निगरानी रखवा रहे हैं। महानगरों में लगभग 38 प्रतिशत दंपति किसी न किसी रूप में एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखने का प्रयास कर रहे हैं। ये आँकड़े केवल दाम्पत्य जीवन की समस्या नहीं हैं, बल्कि उस गहरे विश्वास संकट की ओर संकेत करते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है।
विश्वास किसी भी परिवार की सबसे बड़ी पूँजी होता है। जहाँ विश्वास होता है, वहाँ अभाव भी सहजता से स्वीकार हो जाते हैं; लेकिन जहाँ संदेह प्रवेश कर जाता है, वहाँ अपार संपत्ति भी मन की शांति नहीं दे सकती। आज अनेक परिवारों में एक ही छत के नीचे रहते हुए भी लोग अपने आर्थिक और व्यक्तिगत जीवन को एक-दूसरे से छिपाने लगे हैं। अलग-अलग बैंक खाते, "मेरा पैसा-तुम्हारा पैसा", "मैं क्यों खर्च करूँ, तुम करो" जैसी सोच रिश्तों को साझेदारी से प्रतिस्पर्धा की ओर ले जा रही है। इतना ही नहीं, "मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चे और हमारे बच्चे" जैसी विभाजनकारी मानसिकता परिवार की आत्मीयता को भीतर ही भीतर कमजोर कर रही है।
जब परिवारों में विश्वास कम होता है, तब सहयोग की भावना भी समाप्त होने लगती है। समाज में परस्पर विश्वास घटने का परिणाम यह होता है कि संवेदनशीलता, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व भी कमजोर पड़ने लगते हैं। एक ओर अपार संपत्ति का संचय होता है, तो दूसरी ओर अनेक परिवार जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। यह असंतुलन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है।
प्रश्न यह है कि क्या यही आधुनिकता है? क्या केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता ही विकास का मापदंड है? क्या उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिक धन अर्जित करना है? निश्चित रूप से नहीं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार, विवेकशील और विश्वासयोग्य बनाना है। यदि शिक्षा और आर्थिक समृद्धि के साथ जीवन-मूल्य, पारिवारिक संस्कार, आत्मीयता और सामाजिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़ जाएँ, तो ऐसी प्रगति अधूरी ही कही जाएगी।
एक समय था जब संयुक्त परिवारों में संसाधन सीमित थे, लेकिन विश्वास असीम था। परिवार के सुख-दुःख साझा होते थे, निर्णय सामूहिक होते थे और रिश्तों में अपनापन दिखाई देता था। आज सुविधाएँ बढ़ी हैं, आय बढ़ी है, तकनीक विकसित हुई है, लेकिन संवाद घटा है, आत्मीयता कम हुई है और अकेलेपन ने अनेक घरों में स्थायी स्थान बना लिया है।
यह समय किसी एक वर्ग या पीढ़ी को दोष देने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। पति-पत्नी का संबंध प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि विश्वास और सहभागिता का संबंध है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार है। यदि परिवारों में विश्वास जीवित रहेगा, तो समाज भी मजबूत होगा; यदि परिवार ही संदेह के वातावरण में जीने लगेंगे, तो सामाजिक संरचना भी धीरे-धीरे कमजोर होती चली जाएगी।
आर्थिक प्रगति निस्संदेह आवश्यक है, परन्तु उससे कहीं अधिक आवश्यक है विश्वास, प्रेम, पारदर्शिता, सहयोग और पारिवारिक संस्कारों का संरक्षण । आधुनिकता तभी सार्थक है, जब वह मनुष्यता को सशक्त बनाए, रिश्तों को नहीं तोड़े। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ तकनीक आगे बढ़े, समृद्धि बढ़े, शिक्षा बढ़े, लेकिन सबसे अधिक यदि कुछ बढ़े तो वह हो- एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास । क्योंकि जिस परिवार और समाज में विश्वास जीवित रहता है, वहीं सुख, शांति, समृद्धि और मानवीय गरिमा भी सुरक्षित रहती है।
सुगालचन्द जैन, चेन्नई
मो:9884533399
