श्री देशना संग्रह
घिर आई सांवरी सलोंनी बदरिया
प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष
घिर आई सांवरी सलोंनी बदरिया,,,
झूम रहौ सांउन,लहरारइ बिजुरिया,
घिर आई सांवरी सलोनी बदरिया,,,
महके वन बाग खेत,चहके अंँगनवा,
कोमल कलाई में,खनके कँगनवा,
बरसत जल छलकत है,रस की गगरिया, घिर आई,,,,
प्यासे पपीहा हैं पीव पीव गा रय ,
मतवारे दादुर मजीरा बजारय ,
नच रय हैं मोर,पंख लै रय लहरिया, घिर आई,,,,,
झूलन पै झूल रईं ,हिल मिल कें सखियां,
कै रइँ कछु कजरारीं, नेह भरी अखियां,
पवन के झकोरन सें , उड़ रइ चुनरिया, घिर आई,,,,
रै रै कें पर रइँ हैं ,रस कीं फुहारें,
विरहिन धन द्वारे में, ठांड़ीं मन मारें,
पलकें बिछाएं तकत,पीव की डगरिया, घिर आई,,,
प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़

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