श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

तुम प्रणय का पर्याय हो

6 फ़रवरी 2026

लेखक: Neelam Jain

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अंग प्रत्यंग नव यौवन,

रग रग हर्ष उमंग लहर ।

मृदुल मधुर संवाद सरिता,

अंतःकरण खुशियां महर ।

आनन मस्त वासंती बहार,

मैत्री अनुरक्त अध्याय हो ।

तुम प्रणय का पर्याय हो ।।


स्वर मधुरिमा रिमझिम,

अभिव्यक्ति भाव अंतरंग ।

मोहिनी परिधान श्रृंगार,

दुल्हन सा लावण्य बहिरंग ।

हर पल तरुण अंगड़ाई,

प्रिय मिलन तत्पर संकाय हो ।

तुम प्रणय का पर्याय हो  ।।


हृदय बिंदु नेह सरोवर,

आचार विचार स्वच्छंद।

प्रीत सिक्त सौम्य व्यवहार,

अधर मुस्कान मंद मंद ।

निशि दिन कुंवार उभार,

कामायनी सम चित्त लुभाय हो ।

तुम प्रणय का पर्याय हो ।।


अति सुरभित मन उपवन ,

विचार तरंगिनी मधुमास ।

चाल ढाल मोहक सोहक,

हाव भाव हास्य परिहास ।

तन मन मंदिर सा पावन,

सदा सरित आनंद प्रदाय हो ।

तुम प्रणय का पर्याय हो ।।


कुमार महेन्द्र


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