श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

उत्सवधर्मी

1 फ़रवरी 2026

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जीवन की अंतिम घड़ी,

श्यामल छाया सम्मुख खड़ी,

चित्र, चक्र-सा घूमा,

क्षण भर विहँसा,

छाया के संग चल पड़ा, 

छाया विस्मित! 

जीवन से वितृष्णा 

या उससे प्रीत?

ना वितृष्णा, ना प्रीत,

ब्रह्माण्ड की सनातन रीत,

अंत नहीं तो आरंभ नहीं,

गमन नहीं तो आगमन नहीं, 

मैं आदि सूत्रधार हूँ,

आत्मा का भौतिक आकार हूँ,

सृष्टि के मंच का रंगकर्मी हूँ,

सृजन का सनातन उत्सवधर्मी हूँ!


संजय भारद्वाज ✍️

writersanjay@gmail.com 


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