श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

"मांग रहे हो मान"

16 नवंबर 2025

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"मांग रहे हो मान"


भाती मन को कब कहां,कंजूसन बकवास।

भारी मन से सुन रहे,निर्धन के आवास।।

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मीठे मीठे बोल अब,कैसे आए रास।

पत्र चुनावी घोषणा,सा प्रियतम आभास।।

*

घोड़े अब मजबूर हैं,करने को उपवास।

चने गधों के भाग में,हरी भरी सब घास।।

*

कुछ भी कोई भी कहे,नहीं करेंगे क्रोध।

क्रोध मिटाता बोध को,ऐसा होता बोध।।

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गाली मीठी भी बुरी,देना इसका पाप।

लेने वाला ले रहा,घटे मिटेंगे आप।।

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चुटकी भर सिंदूर सा,देकर कृष्णम ज्ञान 

लेकर मेरी जान भी,मांग रहे हो मान।।


त्यागी अशोका कृष्णम्

कुरकावली,संभल,उत्तर प्रदेश


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