श्री देशना संग्रह
महान जर्मन जैन विद्वान: डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़ (Moriz Winternitz, 1863-1937)
25 जनवरी 2026
महान जर्मन जैन विद्वान: डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़ (Moriz Winternitz, 1863-1937)
जर्मनी में दार्शनिकों और प्राच्यविद्या के विद्वानों का जैन धर्म के प्रति बड़ा अनुराग था। वहां के विश्वविद्यालयों में भारतीय दर्शन के पढ़ाने की व्यवस्था थी। पश्चिम में जैन धर्म के प्रति बहुत ज्यादा अज्ञान और भ्रांतियां थीं, जिन्हें अपने शोध के द्वारा इन महान विद्वानों ने दूर किया। इन विद्वानों में डॉ. हरमन जैकॉबी, डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़, पिशेल, मैक्समूलर आदि प्रमुख थे जिन्होंने भारतीय ग्रंथों का हार्द समझने के लिये प्राकृत और संस्कृत भाषा भी सीखी। इन्होंने जैन धर्म, संस्कृति, और परंपरा को सही रुप में प्रकाश में लाने में अथक परिश्रम किया, जिसके लिये जैन अध्येता इनके ऋणी हैं।
डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़ एक प्रमुख जर्मन (ऑस्ट्रियाई मूल के) इंडोलॉजिस्ट, संस्कृत और प्राकृत विद्वान थे, जिन्होंने जैन साहित्य पर गहन कार्य किया। उन्होंने वियना विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की, मैक्स मूलर के साथ ऑक्सफोर्ड में अध्ययन किया और प्राग विश्वविद्यालय में संस्कृत व नृविज्ञान (Anthropology- मानव समाज, संस्कृति, विकास और व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन) के प्रोफेसर बने। संस्कृत के विशेषज्ञ होने के कारण उन्हें प्राकृत भाषा (जैन आगमों की प्रमुख भाषा) का भी पूर्ण ज्ञान था, जो उनके जैन अध्ययन की आधारशिला था।
जैन धर्म में योगदान:
उनकी कृति Geschichte der indischen Literatur (1908-1922, 3 खंड; अंग्रेजी: A History of Indian Literature) जैन साहित्य का प्राथमिक संदर्भ है।
खंड 2 (Buddhist and Jaina Literature) में जैन आगम (आचारांग सूत्र, सूत्रकृतांग, उत्तराध्ययन सूत्र), तत्त्वार्थ सूत्र, जैन काव्य (हेमचंद्र, हरिभद्र) और नैतिक ग्रंथों का ऐतिहासिक विश्लेषण है।
उन्होंने जैन दर्शन की हिंदू-बौद्ध साहित्य से तुलना कर पाश्चात्य जगत में इसकी प्रामाणिकता स्थापित की।
प्रमुख जैन-संबंधी कार्य और लेख:
"Die Jaina-Literatur": मुख्य पुस्तक के खंड 2 का विस्तृत अध्याय (1920), जैन साहित्य के विकास पर।
The Jainas in the History of Indian Literature (1927/1933, Jina Vijaya Muni संपादित): जैन साहित्यिक योगदान पर स्वतंत्र निबंध।
Catalogue of South Indian Manuscripts (1902): दक्षिण
भारतीय जैन पांडुलिपियों का कैटलॉग, दुर्लभ जैन ग्रंथों का वर्णन।
अन्य पत्र: Zeitschrift der Deutschen Morgenländischen Gesellschaft में अपभ्रंश और जैन ग्रंथों पर टिप्पणियां (Remarks on Pischel’s Materialien zur Kenntnis des Apabhraṃśa, Festschrift 1933 में)।
डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़ के ये कार्य आज भी जैन अध्ययन के मानक हैं। विश्वकवि श्री रवींद्रनाथ टैगोर से उनकी गहरी मित्रता थी। इस मैत्री ने भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रचार में बड़ा योगदान दिया।
यह अवश्य बेहद अफसोसजनक है कि एक तरफ तो इन महान जैन वेत्ताओं के अपूर्व शोधकार्य से वर्तमान के जैन विद्वान अपरिचित हैं और दूसरी तरफ उपरोक्त शोधकृति की कोई कृति किसी जैन शास्त्रागार में सुरक्षित है।
मैं डॉ. हरमन जैकॉबी, डॉ मोरित्ज़ विंटरनिट्ज़ आदि जैन प्राच्यविद्या के विशेषज्ञों के चरणों में विनयपूर्वक नमन करता हूं।
नीलमकांत जीवमित्र
9910378087
