श्री देशना संग्रह
6 नवंबर 2022
अपनी बुराई छिपाना छोड़ दें तो दुख से छुटकारा सम्भव है
नवभारत टाइम्स 11-10-2022
निर्मल जैन
चोरी के अपराध में लंबी सजा भुगतने के बाद जब वह चोर जेल से छूटा तो गेट पर खड़े व्यक्ति ने पूछा -अब तुम आजाद हो क्या करोगे? चोर बोला -सबसे पहले मैं एक टॉर्च खरीदूंगा, क्योंकि टॉर्च ना होने के कारण ही मैं पकड़ा गया। अंधेरे में चोरी करते समय भूल से मेरा हाथ सिक्योरिटी अलार्म के स्विच पर लग गया था। अब इस मनोवृत्ति का कोई क्या करें? जेल में सजा काटने के बाद भी चोर ने यह नहीं सोचा की सजा का कारण चोरी का अपराध है। बल्कि वह कारावास के पीछे अंधेरे को दोषी मान रहा है, टॉर्च के अभाव को दोषी ठहरा रहा है। बस कुछ ऐसी ही स्थिति हमारी है। हम सब भी पाप का निवारण करने के बजाए दुख का निवारण करने में सारी जिंदगी बिता देते हैं। जिस दिन हम पाप को छुपाने के इंतजाम छोड़ देंगे उस दिन दुख हमसे अपने आप ही पीछा छुड़ा लेगा।
दुखी होने को तैयार है पर झुकने को राजी नहीं। अपने अतीत के दुख में और प्राप्त अनुभव से सबक लेकर मिथ्या मार्ग को नहीं छोड़ते ना ही किसी संत या सज्जन के उपदेश से सन्मार्ग पर आते हैं। अपनी शांति खोना मंजूर है लेकिन दुराग्रह छोड़ने को लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। परिचित व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाने को सदैव प्रयत्न रहता है लेकिन पूर्वाग्रह और दुराग्रह से युक्त होकर सज्जनों के साथ स्नेह में वृद्धि करने में असफल रहता है। कीचड़ में पड़ा सिक्का उठाने को तैयार है लेकिन जिन्हें कलुषित भाव से देखता है उनके गुणों पर दृष्टि डालने से परहेज करता है। अपनी खुशी के लिए सामने वाले के आंसू भी बहाने पड़े तब भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। निश्चित समय पर मंजिल पर पहुंचने के लिए रास्ते की कंकड़ पत्थर कील कांटों को हटाने को तैयार है लेकिन जब कहीं किसी व्यक्ति से समझौता करने का मन होता है तो उसके प्रति भूतकाल में घटित कटु प्रसंगों की स्मृति को भुलाने को तैयार नहीं।
बुद्ध कहते हैं -दुखी होने से परेशानियां खत्म नहीं होती, हर इंसान को दुख से छुटकारा पाने के लिए उससे जुड़ी बातों पर विचार करना चाहिए। हर दुख से छुटकारा पाने का कोई न कोई उपाय जरूर होता है, दुख को कभी खुद पर हावी न होने दें। जीवन को हम अपने स्वयं में न रख कर कहीं और ही रख देते हैं, जैसे किसी बैंक के खाते में। लोग बैंक के खाते में अपनी पूंजी ही नहीं, साथ में अपना जीवन भी जमा करवा के रखते हैं। कहीं कुछ बैंक डूब जाए, पूंजी चली जाए तो उनकी हृदयगति ही रुक जाती है।
कोई वस्तु, विषय, जिसको हम अपने जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, वही हमारे जीवन में दुःख का कारण बनता है। दुख का आना और हमारा दुखी होना इसमें हम जितना भेद कर देंगे, जितनी दूरी बना देंगे, उतने ही हम आनंद के निकट चले जाएंगे। सुख आता है तो मनुष्य अहंकार में डूब जाता है, दुख आता है तो तनावग्रस्त हो जाता है। ये दोनों ही चीजें भीतर से पैदा की गई हैं। हम दोनों ही स्थितियों में अपने आपको थोड़ा संसार से अलग करके भीतर स्वयं से जुड़ें तो लगने लगेगा कि सुख आए या दुख, दोनों को ही हम अलग खड़ा होकर देख रहे हैं। जितना इनसे खुद को अलग करेंगे उतना ही हम भगवान से जुड़ते जाएंगे।
