श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

खोटे सिक्के जहाँ पे चलते हैं

आलेख21/7/20231 मिनट पढ़ने का समय

 जब  भी  हम रास्ता  बदलते हैं

पहले गिरते है फिर  संभलते हैं


फर्श पर क्यूं न  हो बसर अपनी

ख़ाक हैं ख़ाक  पर  ही पलते हैं


रख के नज़रों को दूर मंज़िल पर

बे  धड़क  पत्थरों   पे   चलते  हैं


वैसे  फ़ौलादी  सीना है  फिर भी

नर्म  बातों  से  हम   पिघलते  हैं


तेरे  इस   शहर   से   मेरी  तौबा

खोटे  सिक्के  जहाँ  पे  चलते हैं

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कपिल कुमार

बेल्जियम

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