श्री देशना संग्रह
बोला मुझसे चाँद
17 जनवरी 2026
अक्षय राज शर्मा
'राष्ट्र' का अर्थ नहीं होता,
केवल कोई सरकार।
मातृभूमि के प्रति जगाए,
प्रेम यह शाब्दिक-बयार।।१
आज देश में लोग कितने,
करें स्वदेश का समर्थन।
सब सत्ता-लोलुप हो घूमें,
धनी हो या कि निर्धन।।२
शिक्षा - दीक्षा भूल सभी,
अपनी - अपनी ही हाँकें।
वैर-द्वेष में फँसे पड़े सब,
बन छैल - गाबरु बाँके।।३
चित्र-चरित्र स्थिर न कोई,
दीखें आज सभी व्याकुल।
ज्यूँ क्रूर - काल फंदे में,
फँस रह गईं सभी बुलबुल।।४
बैठा मैं एकाकी छत पर,
न हलचल न कूद-फाँद।
तभी लपक हाथ मिलाने,
आ पहुँचा वहाँ पर चाँद।।५
उसको आया देख उचक कर,
आगे बढ़ मैंने हाथ मिलाया।
आज अचानक कैसे आये,
संदेस भी नहीं भिजवाया।।६
चंदा का मन दुखी बड़ा था,
बोला,'सुन,मेरी अक्षय बात।
घिरी हुई है देश पर तेरे,
घातक राजनीतिक - रात।।७
कान पास ला सुन भेद,
कहीं सुन न ले दीवार।
कंधे पर यहाँ लट्ठ धरे,
घूमा करते हैं पहरेदार।।८
हट्टे - कट्टे चोर हैं इनके,
सब ही तो शागिर्द।
सन्नाटे में क्यों सिमटा बैठा,
समस्याएँ तेरे इर्द - गिर्द।।९
क्या बतलाऊँ चंदा मामा,
मन मेरा बहुत विचलित है।
भ्रष्टाचारियों की पौ - बारह,
मंत्री जी भी *विगलित हैं।।१० *पतित
चुने गए चोरों के द्वारा,
मंत्रियों के मुँह यूँ बंद हैं।
स्वार्थ में डूबी हुई जनता भी,
कहो कौन-सी अक्लमंद है।।११
भ्रष्टाचार के सुलभ - तंत्र ने,
सबके बढ़ा दिए चौगुने चाव।
मन - मसोस कोने में जा बैठा,
यूँ लुढ़का सदाचारी का भाव।।१२
आधुनिकता के नाम पर देखो,
पाखंडी बन बैठे उत्स्वधर्मी।
देखो आज बाजार झाँक कर,
बिक रही है महंगी बेशर्मी।।१३
रातभर ताक-झाँक कर मामा,
अंततः तुम भी हो अकुलाते।
तुम कौन शातिर से कम हो,
कभी-कभार सुध लेने आते।।१४
देवासुर - संग्राम छिड़ा है,
है धरती बेचारी भयभीत।
किस-किससे वह लाड़ लड़ाए,
नहीं किसी को उससे से प्रीत।।१५
