श्री देशना संग्रह
मानव जीवन का आनंद:* एक चिंतन
एन. के. जीवमित्र
🍁 इस धरती पर मानव के अलावा भी अनंत जीव हैं, जिनकी मानव से कोई तुलना नहीं है। मनुष्य छोटी-छोटी बातों, असफलताओं और अनुपलब्धियों के कारण अवसाद में घिरकर दुःखी हो जाता है। यदि वह एक बार पशुओं के कठिनाइयों भरे जीवन पर विचार करे और अपने जीवन की तुलना उनके जीवन से करके देखे, तो उसे मनुष्य जीवन की वास्तविक महिमा और आनंद का बोध हो सकता है।
हम मनुष्यों का जीवन सुविधाओं, सुरक्षा और सामाजिक सहयोग से भरा हुआ है, जबकि पशुओं का अधिकांश जीवन भोजन, पानी, सुरक्षा और आश्रय की तलाश तथा निरंतर भय के बीच बीतता है। वे बेचारे तो अपने बच्चों को गले तक से भी नहीं लगा पाते हैं।
🍁 जंगलों में विचरण करने वाले कुछ पशु तो फिर भी अपने प्राकृतिक परिवेश में जी लेते हैं, लेकिन शहरों के बेसहारा कुत्ते, बिल्लियाँ और गाय-बैल आदि कितनी यातनाएँ झेलते हैं! उन्हें भूख-प्यास का सामना तो करना ही पड़ता है, साथ ही मनुष्यों की लातें, पत्थर और गालियाँ भी रोज सहनी पड़ती हैं। न छिपने का सुरक्षित स्थान, न कोई स्थायी सहारा—सिर्फ प्रकृति की कठोरता और मानवीय उदासीनता। कई बार तो ऐसा लगता है मानो यह संसार उनका नहीं, बल्कि उनके विरुद्ध खड़ा है।
वर्तमान में न्यायालयों में कुत्तों से संबंधित जो कठोर टिप्पणियाँ और निर्णय सामने आए हैं, उनसे भी इस समस्या का एक चिंताजनक पक्ष दिखाई देता है।
🍁 सबसे विकट संकट तब आता है, जब इन निरीह प्राणियों के जीवन में संतानोत्पत्ति का समय आता है। मनुष्य के लिए तो प्रसव एक पारिवारिक अवसर होता है—परिवार, रिश्तेदार, डॉक्टर और अस्पताल की पूरी व्यवस्था उसके साथ होती है। लेकिन पशु-माता को अकेले ही प्रसव की पीड़ा झेलनी पड़ती है। बच्चे के जन्म के साथ ही उसकी सुरक्षा और भोजन की जिम्मेदारी भी उसी के ऊपर आ जाती है। उस समय वह केवल माँ नहीं होती, बल्कि अपने शिशुओं की एकमात्र रक्षक भी होती है।
🍁 उदाहरण के लिए, गायों के साथ अक्सर ऐसा होता है कि प्रसव के समय उनका गर्भाशय बाहर निकल आता है। यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति होती है। यदि कोई दयालु मनुष्य समय पर सहायता न करे, तो वह असहाय प्राणी कुत्तों या अन्य हिंसक जीवों का शिकार भी बन सकती है। मैंने स्वयं देखा है कि कुछ करुणामयी लोग ऐसे समय में गाय की सहायता करते हैं और गर्भाशय को सावधानी से भीतर कर उसकी रक्षा करते हैं। ऐसे क्षणों में अवश्य लगता है कि मानवता अभी जीवित है।
🍁 इसी बहाने अपनी बिल्ली ‘भोली’ की भी बात कर लेता हूँ। वह इतनी सरल, सीधी और शांत है, जैसा कि उसका नाम है।
पिछले वर्ष भोली ने तीन बच्चों को जन्म दिया था, लेकिन गार्डों ने उन्हें कहीं और शिफ्ट कर दिया। इसके बाद भोली ने उन्हें छुआ तक नहीं और उन्हें ऐसे छोड़ दिया, जैसे वे उसके बच्चे ही न हों। बिल्लियों के साथ ऐसा कभी-कभी होता है। मैंने दो दिन तक उन नन्हे प्राणियों को दूध पिलाकर जीवित रखने की कोशिश की, लेकिन अंततः माँ के प्यार और दूध के अभाव में वे दम तोड़ गए। कुछ समय बाद भोली ने फिर छह बच्चों को जन्म दिया और उन्हें तब सामने लाई, जब वे कुछ बड़े हो गए थे। लेकिन दुर्भाग्य से वे सभी एक-एक करके कारों के नीचे आकर जान गंवा बैठे। भोली बेचारी अपने बच्चों की मृत्यु पर रो भी नहीं सकी।
अभी पिछले सप्ताह उसने फिर चार सुंदर बच्चों को जन्म दिया है। वह प्रतिदिन तीन बार दूध पीने आती है। मेरी पत्नी उसे हमेशा मलाई वाला दूध देती हैं, क्योंकि उसे अपने बच्चों को भी दूध पिलाना है।
भोली के साथ घटी ये हृदयविदारक घटनाएँ आज भी स्मृति में टीस पैदा करती हैं। मनुष्य को इस तरह के कष्टों का सामना शायद ही कभी करना पड़ता है।
🍁 इसी प्रकार सड़कों पर घूमने वाली गर्भवती कुत्तियाँ वर्षा में भीगती हुईं, कूड़ेदानों से भोजन खोजती हुईं और अपने बच्चों की रक्षा करती दिखाई देती हैं। जैसे ही वे थोड़ी देर के लिए हटती हैं, लोग उनके सुंदर बच्चों को उठा ले जाते हैं। पिछले वर्ष मेरठ में एक देवरानी-जेठानी ने गली में एक कुतिया के भूखे पिल्लों के रोने की आवाज से नाराज़ होकर उन पर पेट्रोल डालकर उन्हें जिंदा ही जला दिया था। पशुओं के प्रति, विशेषकर कुत्तों के प्रति, कुछ मनुष्यों की नफरत किस हद तक पहुँच सकती है, यह समय-समय पर सामने आने वाली घटनाओं से पता चलता है।
🍁 पक्षियों का तो कहना ही क्या! अपने चूजों के लिए दाना खोजने में वे कितनी दूरियाँ तय करते हैं और मानवीय जालों, तारों तथा तेज रफ्तार वाहनों से बचने का संघर्ष करते रहते हैं। उनका हर दिन मानो जीवन और मृत्यु के बीच का संघर्ष होता है।
चींटियाँ वर्षा ऋतु के लिए दाने इकट्ठे करती रहती हैं, लेकिन तेज बारिश उनके बिलों में घुसकर एक ही झटके में उनकी पूरी दुनिया समाप्त कर देती है।
इसकी तुलना में मनुष्य अपने जीवन की सुविधाओं पर विचार करे तो उसे अनुभव होगा कि हमारे बहुत-से दुःख वास्तव में कितने छोटे हैं।
🍁 जब हम इन दृश्यों पर गंभीरता से विचार करते हैं, तब मनुष्य जीवन के महत्व और अपने सौभाग्य का वास्तविक बोध होता है। हम चाहे किसी भी आर्थिक या सामाजिक स्थिति में हों, हमारे पास भाषा है, बुद्धि है, संगठन की शक्ति है और धन अर्जित करने की क्षमता भी है। जानवरों को तो अथक परिश्रम करने के बाद भी थोड़ा-सा दाना-चारा मिल जाए, तो उनका सौभाग्य है।
🍁 शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मा अजर-अमर है। आज हम मनुष्य योनि में हैं, कल अन्य योनि में भी जा सकते हैं। अतः इस मानव जन्म का लाभ उठाकर हमें पशु-पक्षियों की सहायता अवश्य करनी चाहिए। उन्हें भोजन दें, आश्रय प्रदान करें और आवश्यकता पड़ने पर उनकी चिकित्सा करवाएँ।
यह केवल मानवता का परिचय ही नहीं होगा, बल्कि पुण्य-संचय का भी कारण बनेगा। हमें भी तो एक दिन इस जीवन से मुक्त होना पड़ेगा। पता नहीं किस योनि में अगला जन्म मिले?
🍁 इसी संदर्भ में जैन आगमों में जीवों की समान संवेदना का अत्यंत सुंदर संदेश मिलता है। भाव यह है कि जिस प्रकार मनुष्य सुख चाहता है और दुःख से बचना चाहता है, उसी प्रकार संसार के सभी जीव—चाहे वे छोटे हों या बड़े—सुख की इच्छा रखते हैं और कष्ट से बचना चाहते हैं।
इस सत्य को समझकर हमें किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट या मृत्यु नहीं देनी चाहिए।
🍁 अन्य जीवों के प्रति संवेदनशीलता, करुणा और दयाभाव ही हमें सच्चा मानव बनाते हैं। यदि हम यह भाव अपनाएँ और पशु-पक्षियों की सहायता करें, तो हमारा जीवन भी अधिक सार्थक और पुण्यमय बन सकता है।
🍁 भीष्म पितामह और साँप की एक प्रचलित कथा भी इस संदर्भ में बड़ी मार्मिक सीख देती है।
कहा जाता है कि पूर्वजन्म में भीष्म ने रास्ते में पड़े एक साँप को वहाँ से हटवाकर काँटों में फिंकवा दिया था। साँप उन काँटों में फँस गया और मृत्यु से पहले कई दिनों तक पीड़ा सहता रहा। प्रचलित कथा के अनुसार, उसी कर्म का फल भीष्म को शरशैया पर लंबे समय तक पड़े रहकर भोगना पड़ा।
इस कथा का नैतिक संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है—हमें अपनी सुविधा, असावधानी या उपेक्षा के कारण भी किसी जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए।
🍁मनुष्य जिस प्रकार अपने सुख-दुःख को समझता है, उसी प्रकार पशु-पक्षी और अन्य जीव भी पीड़ा, भय और जीवन की इच्छा रखते हैं। उनके प्रति हमारा दायित्व केवल इतना नहीं कि हम उन्हें मारें नहीं, बल्कि यह भी है कि हमारे किसी कृत्य से उन्हें अनावश्यक पीड़ा न पंहुँचे।
जो पीड़ा हम स्वयं अपने लिए स्वीकार नहीं कर सकते, वही पीड़ा किसी निरीह जीव को देना भी उचित नहीं हो सकता। अहिंसा की वास्तविक भावना यहीं से प्रारंभ होती है।
“*मनुष्य और पशु में अंतर बुद्धि का हो सकता है, पीड़ा का नहीं*।”
🍁 आइए, आज से ही यह संकल्प लें कि हमारा मानव जीवन अमूल्य है, हमें इसे आनंदपूर्वक और सार्थक रूप से जीना है। जहाँ तक संभव हो, हम किसी भी जीव को कष्ट नहीं देंगे और जरूरतमंद पशु- पक्षियों की सहायता अवश्य करेंगे।
इसी करुणा, संवेदना और अहिंसा से हमारा मानव जीवन वास्तव में धन्य होगा।
— एन. के. जीवमित्र
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