श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

'भाषा की पाठशाला' में आज के शब्द : नैवेद्य, प्रसाद, भोग, भोगना और भुगतना।

कमलेश कमल

आलेख21 अगस्त 20262 मिनट पढ़ने का समय

भोग : यह बना है ‘भुज्’ धातु से और इसका अर्थ है– भक्षण करना, खाना, आस्वादन करना। भोग भोजन का भी होता है, किसी कर्म के परिणाम का भी और जीवन के दुःख-सुख का भी। दैनंदिन जीवन में जब पूजा-अर्चना के निमित्त हम कुछ ‘भोग’ लगाते हैं, तो इसे प्रभु पहले रस-रूप में ही चखें अथवा ग्रहण करें– ऐसी अभिलाषा रखते हैं। कर्मफल-भोग रूप में यह ‘भोग’ सुखद अथवा दुःखद कुछ भी हो सकता है; इसलिए कहा जाता है कि जो भोग होगा, वह भोगना ही पड़ेगा।

भुगतना : भोग से बने विकारी रूप ‘भुगतना’ का अर्थ बुरा परिणाम भोगने के लिए रूढ हो गया है। यहाँ ध्यातव्य है कि रूढ को तद्भव रूप में ‘रूढ़’ भी लिखा जा सकता है, जैसे ‘जड’ को तद्भव रूप में ‘जड़’ लिखा जा सकता है।

स्मरण रहे कि यह तो कहा जा सकता है कि तुमने ग़लती की है तो अब सजा भुगतो; पर यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि तुमने कठिन परिश्रम कर सफलता पाई है, अब सुख-समृद्धि भुगतो। हाँ, सुख-समृद्धि जैसे सकारात्मक अर्थ में ‘भोग’ शब्द का प्रयोग बिलकुल ठीक है।

नैवेद्य : संस्कृत की ‘विद्’ धातु में जानने, सीखने, अनुभव करने इत्यादि का भाव है। इसी से ‘वेद’ शब्द बना है तो इसी से विद्या, वेदना, निवेदन इत्यादि शब्द भी बने हैं। इसी विद् से बना है– निवेद्य (नि+ विद् + ण्यत्), जिसका अर्थ है– किसी देवमूर्ति को भोग लगाना और निवेदन करना। आगे, इसी से संज्ञा शब्द ‘नैवेद्य’(निवेद् + ष्यञ्) बना है। एक वाक्य में कहें तो जब हम ईश-आराधना के समय कुछ रख कर ईश्वर से निवेदन करते हैं तो वह ‘नैवेद्य’ बन जाता है।

प्रसाद : नैवेद्य चढ़ाने के बाद जो बच गया, वह ‘प्रसाद’ है, जिसे भक्त ग्रहण करता है। प्रसाद और नैवेद्य में मूल अंतर यह है कि नैवेद्य ईश्वर ग्रहण करते हैं, जबकि प्रसाद भक्त ग्रहण करते हैं। ऐसे प्रसाद शब्द के कई अर्थों में यह केवल एक अर्थ है। प्रसाद (प्र+ सद् +घञ्) शब्द के कई अन्य अर्थ भी हैं, जैसे– 1. कृपा या अनुग्रह 2. अच्छा स्वभाव, जिसे साहित्य में प्रसाद-गुण कहा जाता है। 3.स्वच्छता, निर्मलता, पारदर्शिता। 4. चढ़ावा इत्यादि।

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