श्री देशना संग्रह
मकर संक्रांति – हमारी चिर पुरातन संस्कृति का उत्सव ।
14 जनवरी 2026
हिंदू त्योहारों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि प्रकृति, विज्ञान और जीवन दर्शन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन आधिकारिक रूप से नई फसल का मौसम आरंभ होता है और किसान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। मकर संक्रांति एक खगोलीय घटना पर आधारित है, जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ता है और मकर राशि में प्रवेश करता है। विज्ञान के अनुसार यह सूर्य के खगोलीय भूमध्य रेखा को पार करने का संकेत है, जो शीतकालीन संक्रांति के बाद प्रकाश और ऊर्जा की बढ़ती यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
सनातन परंपरा में सूर्य को केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि एक सचेत देवता के रूप में पूजा जाता है। सूर्य जीवन का आधार है और उनकी उपासना ऋग्वेद के गायत्री मंत्र से जुड़ी हुई है। इस पावन अवसर पर भक्त गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान कर आत्मशुद्धि का अनुभव करते है और सूर्य को अर्घ्य देकर कृतज्ञता व्यक्त करते है । यह समय विशेष रूप से शुभ और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है।
मकर संक्रांति का कृषि और सामाजिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। यह फसल कटाई का पर्व है, जो प्रकृति के चक्र और मानव परिश्रम के सम्मान को दर्शाता है। परिवार एकत्रित होते है, दान-पुण्य किया जाता है और समाज में सौहार्द तथा सहयोग की भावना प्रबल होती है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर और जड़ता से नवचेतना की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
मकर संक्रांति हमें अपनी चिर पुरातन संस्कृति, वैज्ञानिक दृष्टि और आध्यात्मिक मूल्यों की याद दिलाती है, जो आज भी हमारी पहचान का आधार है।
प्रोफेसर कुमार रत्नम
