श्री देशना संग्रह
ग़ज़ल
5/2/2026•1 मिनट पढ़ने का समय
छोड़कर अपनी अना जो भी बदल जाते हैं
बन के नूरानी बहुत आगे निकल जाते हैं
सब परखते हैं यहाँ यूँ तो बड़े नोटों को
और कुछ सिक्के मगर खोटे भी चल जाते हैं
मिलने-जुलने से बनी रहती है कुछ गर्माहट
वर्ना रिश्ते भी किसी बर्फ़ में ढल जाते हैं
हादसे टालना चाहो भी तो टलते हैं क्या
सर पे उसका हो अगर हाथ तो टल जाते हैं
शायरी से तो हमें और नहीं कुछ हासिल
दिल बहलता है 'धरम' यार बहल जाते हैं
धर्मेन्द्र तिजोरीवाले 'आज़ाद'

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