मातु वंदना

समय बड़ा अनमोल है, करना मत बेकार।
बीता जीवन फिर कभी, मिलता नहीं उधार ।
जो करता श्रमदान है,प्राप्त करें हर लक्ष्य,
उस पर माँ करती कृपा,भर देती भंडार।।

सागर पुत्री आप हैं,नहीं अर्थ की थाह।
श्री हरि के उर में बसी,मिटी हृदय की आह।
जन-जन का कल्याण कर, करती भव से पार,
माँ लक्ष्मी झोली भरें,पूर्ण करें हर चाह।।

द्वार तुम्हारे आकर मैया, सुख की झोली भरती।
बड़ी दयालू तू जग में है, दुख सारे ही हरती।
भवन गूंँजती घंटा धवनि है, पूजन अर्चन होता,
प्रबल वेग से स्नेहिल अनुपम, भाव भरी वर्षा करती।।

करें मातु पग वंदना, करती कृपा महान।
चले अनवरत क्रम यही, देती जग पहचान।
मांँ संतोषी दीन की सुनती करुण पुकार,
मनोकामना पूर्ण कर,माँ देती अनुदान।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता रायबरेली उत्तर प्रदेश

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