।।लक्ष्मी के तीन रूप-समृद्धि का सच्चा स्वरूप ।।

राजस्थान की लोक परंपरा में एक सुंदर कहावत प्रचलित है कि समृद्धि, अर्थात् लक्ष्मी, जब भी जीवन में प्रवेश करती है तो तीन रूपों में आती है- माँ, धर्मपत्नी और बेटी ।
जिसके जीवन में वह जिस रूप में आती है, व्यक्ति उसी अनुसार उसका उपयोग, सम्मान और विस्तार करता है।
1. माँ के रूप में लक्ष्मी जब लक्ष्मी माँ के रूप में आती है, तो व्यक्ति उसकी पूजा-अर्चना तो करता है, पर उसका उपयोग नहीं कर पाता।
वह धन को सहेजकर रखता है, खर्च करने में संकोच करता है, और “चमड़ी जाय दमड़ी न जाय” जैसी प्रवृत्ति अपना लेता है।
ऐसे लोग धन के रक्षक तो बन जाते हैं, पर उसके रस का अनुभव नहीं कर पाते।अंततः वह लक्ष्मी तिजोरी में ही बंद रह जाती है और जीवन के साथ नहीं चल पाती। धन यदि गतिहीन हो जाए तो वह साधन नहीं, केवल संग्रह बनकर रह जाता है।
2. धर्मपत्नी के रूप में लक्ष्मी
जब लक्ष्मी धर्मपत्नी के रूप में आती है, तो व्यक्ति उसका भरपूर उपयोग और उपभोग करता है। वह सुख-सुविधाओं, ऐश्वर्य और भोग-विलास में धन का प्रयोग करता है, पर अधिकतर अपने तक सीमित रहता है। ऐसी लक्ष्मी जीवन में आनंद तो देती है, पर विस्तार नहीं देती। उसमें साझेदारी और परोपकार का भाव नही होता हैं ।वह केवल व्यक्तिगत सुख तक सिमट जाती है।धन का यह रूप चमक तो देता है, पर उजाला कम फैला पाता है।
3. बेटी के रूप में लक्ष्मी
जब लक्ष्मी बेटी के रूप में आती है, तो उसका स्वभाव ही दान, करुणा और विस्तार का होता है। बेटी घर में स्थायी नहीं रहती, उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी गतिशील रहती है- दान, सेवा और जनहित के रूप में प्रवाहित होती है।
देने से यह घटती नहीं, बल्कि और अधिक बढ़ती है। यह दो परिवारों का कल्याण करती है-जैसे बेटी मायके और ससुराल दोनों की समृद्धि की कामना करती है। इस रूप में आई लक्ष्मी केवल धन नहीं रहती, वह संस्कार, सहानुभूति और सद्भाव की धारा बन जाती है।
समृद्धि स्वयं में न अच्छी है, न बुरी- उसका स्वरूप हमारे दृष्टिकोण और उपयोग से तय होता है। यदि धन में माँ का सम्मान, धर्मपत्नी का संतुलित उपयोग, और बेटी का दानशील विस्तार -तीनों भाव जुड़ जाएँ, तो वही लक्ष्मी है।
आवश्यक है कि हम लक्ष्मी का केवल संग्रह न करें, केवल उपभोग न करें, बल्कि उसका सदुपयोग और परोपयोग करें।क्योंकि जो धन केवल अपने लिए जिया, वह सीमित रह गया; और जो धन समाज के लिए बहा, वह अमर हो गया।अब प्रश्न हम सबके सामने है-हम अपने जीवन में लक्ष्मी का स्वागत किस रूप में करना चाहेंगे?


सुगाल चंद जैन, चेन्नई

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