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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम: गुणों से रची एक जीवंत कथा

30 जनवरी 2026

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 डॉ. लवकुश सिंह चौहान | पुणे, महाराष्ट्र

अयोध्या की गलियों में जब कौशल्या के आँगन में राम का जन्म हुआ, तब वह केवल एक राजकुमार का जन्म नहीं था, बल्कि मानवीय मूल्यों के एक सजीव आदर्श का अवतरण था। बालक राम का स्वभाव आरंभ से ही करुणा से परिपूर्ण था। जो भी उनके समीप आता, उसे अपनापन और आश्वासन मिलता। यही करुणा आगे चलकर सीता जी के प्रति उनके आशीर्वचन में प्रकट होती है, जहाँ तुलसीदास कहते हैं—

“सुन्नो सिय सत्य असीस हमारी। पूजहि मन कामना तुम्हारी॥ ”

यह केवल दांपत्य स्नेह नहीं, बल्कि दीनदयालु हृदय की अभिव्यक्ति है, जिसमें दूसरे के दुःख और सुख दोनों के प्रति संवेदनशीलता है।

समय बीतता है। राम युवावस्था में प्रवेश करते हैं और राजतिलक का समय आता है। परंतु इसी क्षण जीवन उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेता है। पिता दशरथ के वचन की रक्षा के लिए वे राज्य, वैभव और सुख—सबका त्याग कर देते हैं। तुलसीदास इस क्षण को रघुकुल की परंपरा के रूप में स्थापित करते हैं—

“रघुकुल रीत सदा चली आई।प्राण जाई पर वचन न जाई॥”

यहाँ राम केवल पुत्र नहीं, बल्कि सत्य के मूर्तिमान रूप बन जाते हैं। उनके लिए धर्म और सत्य किसी सुविधा पर आधारित नहीं, बल्कि आत्मा का अनुशासन हैं।

वनगमन का निर्णय उनके धर्मपरायण स्वरूप को और गहरा करता है। राम जानते हैं कि धर्म केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में लिए गए निर्णयों में प्रकट होता है—

“ धरम न दूसर सत्य समाना।आगम निगम पुरान बखाना॥”

अयोध्या से प्रस्थान करते समय पिता की आज्ञा को वे मस्तक पर धारण करते हैं। न विरोध, न प्रश्न—केवल कर्तव्य—

“ पितु आयसु सिर धरि जुहारी।निकसे राम संग महतारी॥ ”

वन का जीवन सहज नहीं था, परंतु राम का मन वहाँ भी विचलित नहीं हुआ। अभावों के बीच भी संतोष उनके स्वभाव में बना रहा—

“ संतोष परम सुख लहि कोई।संतोष बिना सुख नाहीं होई॥ ”

सीता के साथ उनका व्यवहार वनवास में और अधिक आदर्श रूप ले लेता है। वे पति होते हुए भी स्वामी नहीं, बल्कि सहचर हैं—

“पति परमेश्वर सीय जानकी।सेवहिं सुमिरि सनेह सुहागी ॥”

लक्ष्मण के साथ उनका संबंध केवल भ्रातृभाव तक सीमित नहीं रहता। राम का स्नेह मार्गदर्शन बन जाता है—

“भ्राता लक्ष्मन प्रान समाना।परम सनेह बस राम सुजाना॥ ”

वन में राक्षसों के आतंक के बीच भी राम निर्भीक रहते हैं। वे किसी से वैर नहीं रखते, पर अधर्म के सामने झुकते भी नहीं—

“बयरू न कर काहू सन कोई।राम प्रताप विषमता खोई॥”

राम का न्यायबोध उन्हें पक्षपात से दूर रखता है। उनके लिए बड़ा-छोटा, राजा-प्रजा सब समान हैं—

“ सम दरसी रघुबीर हमारे।बड़े छोटे सब पर सम तारे॥”

किष्किन्धा में सुग्रीव से मित्रता करते समय राम यह दिखाते हैं कि सच्ची मित्रता स्वार्थ नहीं, संकट में निभाई जाती है—

“ प्रभु पहिचानी मित्रता कीन्ही।संकट हरन सनेह अधीन्ही ॥”

हनुमान से मिलकर राम का भक्तवत्सल स्वरूप प्रकट होता है। उनके लिए बाहरी योग्यता नहीं, प्रेम ही सबसे बड़ा गुण है—

“रामहि केवल प्रेमु पियारा।जान लेहु जो जाननहारा॥ ”

लंका में विभीषण शरण आता है। सभा में संशय होते हुए भी राम स्पष्ट कहते हैं कि शरणागत का त्याग अधर्म है—

“ सुनु विभीषण प्रभु की रीती।करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥”

समुद्र के सामने खड़े होकर राम जो साहस दिखाते हैं, वह केवल शारीरिक नहीं, नैतिक भी है—

“गरल सुधा रिपु करय मिताई।गोपद सिंधु अनल सितलाई॥”

लंका विजय के बाद भी राम के मन में प्रतिशोध नहीं, बल्कि क्षमा है—

“ क्षमाबंत रघुनायक जाना।दोष देखिउ न हृदय बसाना॥”

अयोध्या लौटकर रामराज्य की स्थापना होती है, जहाँ कोई भयभीत नहीं, कोई उपेक्षित नहीं—

“ दैहिक दैविक भौतिक तापा।रामराज नहिं काहूहि ब्यापा॥ ”

और अंततः तुलसीदास राम को समस्त लोक के मंगलकर्ता के रूप में प्रणाम करते हैं—

“ मंगल भवन अमंगल हारी।द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥ ”

उपसंहार

इस प्रकार श्रीराम की कथा किसी एक गुण की नहीं, बल्कि सोलह मानवीय मूल्यों की जीवंत यात्रा है। वे केवल अतीत के नायक नहीं, बल्कि आज के समाज, शासन और शिक्षा के लिए भी आदर्श हैं। यही कारण है कि भारतीय परंपरा उन्हें केवल राम नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम कहती है।

 डॉ. लवकुश सिंह चौहान

| पुणे,  


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