श्री देशना संग्रह
क्या योजक जरूरी है?
4 जनवरी 2026
गंगा-जल, गंगा जल और गंगाजल -- तीनों का अर्थ एक है, स्वाद एक है और स्वभाव एक है। पर परिस्थितियों का अंतर है। गंगा - जल में योजक है। गंगा जल में योजक नदारद है। गंगाजल से योजक हटा तो दोनों पदों को छूट मिल गई। इनमें सन्धि तो हो नहीं सकती क्योंकि मिलनशील तत्त्व हैं नहीं। सो, वे पास - पास आ गए। उनमें संगम हो गया।
दिल कर रहा है, इनकी स्थिति और मनोदशा समझूँ!
गंगा-जल में एक सम्बन्ध है। वे एक- दूसरे से बँधे हैं। रिश्ता तोड़ नहीं सकते। किंतु उनके बीच एक फासला भी है, उससे भी नहीं बच सकते। ये दोनों आजीवन एक -दूसरे के साथ रहेंगे किंतु कभी मिल नहीं पाएँगे। ये अभिशप्त हैं। इन्हें नज़दीकी और दूरी का शाप मिला है।
ये रेलगाड़ी की पटड़ियाँ हैं। ये चाहे संसार-भर से रिश्ता रखें किंतु इन्हें एक-दूसरे का नहीं होना है। इनके बीच एक स्थायी द्वन्द्व रहना है। तभी ये अक्सर द्वन्द्व समास में सुशोभित होते हैं। तत्पुरुष होते तो कभी के आपस में मिल गए होते। वे बीच में आए योजक को हटाते । अपने संगी के आसपास रहते । चाहे नाम सन्धि न होता , संगम होता यानी लिव इन होता । वे कम-से-कम आपस में सट कर तो बैठते। इक-दूजे के करंट को अपने भीतर जाने देते। संबंधों की सुगंध से महमह होते।
देखो न, रसोईघर रसोई - घर भी हो सकता था। पर नहीं, इन्होंने बीच के योजक को, जो प्रॉपर्टी डीलर-सा दोनों के बीच बलात पड़ा हुआ था, दोनों का रस चूसने के लिए, उसे हटाया। कुछ खतरा खुद उठाया और संगम कर बैठे।
संगम के लिए, समास के लिए, सहवास के लिए या गणतंत्र के लिए समर्पण जरूरी है। अहं का विसर्जन जरूरी है।
और यह भी जरूरी नहीं कि समास के लिए किसी को अपने अंग सिमटाने पड़ें। गंगाजल को ही देखिए! न गंगा को आ हटाना पड़ा। न जल को उत्सर्ग करना पड़ा। बस दोनों में आपसी सहमति हुई, अनुबंध हुआ और दोनों चुपचाप लिव इन में रहने लगे। गंगा ने मान लिया कि जल ही प्रधान होगा। वह दाहिने होगा। मैं वाम अंग बन जाऊँगी। फिर भी गंगाजल कहलाऊँगी। जल को प्रधान मानूँगी और मैं प्रथम पद होकर भी दूसरे पद के अधीन रहूँगी। आखिर वह है तो मेरा ही। इसे लिव इन न कहो, विदेशी गंध लिए हुए है, संगम कहो। मन में प्रश्न उठ रहा है -- गंगा-जल ठीक है या गंगाजल? गंगा-जल में स्वतंत्रता है। निजता की पहचान है। रूप छोटा है। पहचानना भी आसान है। बोलना भी आसान है। बस कमी यह है कि दोनों की देहों में आत्मीयता पैदा करने वाला करंट नहीं है।
पर गंगाजल की बात ही कुछ और है! उसमें गंगा और जल इक-दूजे में मिल गए हैं। उनमें अंतर बचा ही नहीं। वे सार्थक हैं, सफल और धन्य हैं। वे चरम आनंद में जी रहे हैं। परन्तु उनका स्वत्व खो गया है। ये अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने को व्यग्र आधुनिक सुशिक्षित युगल नहीं हैं। आजकल की सुशिक्षित नववधुएँ पहले की तरह नहीं हैं कि शादी के बाद अपनी मूल पहचान भूल जाएँ। वे वैवाहिक पहचान के साथ अपनी मूल पहचान भी साथ लगाती हैं। जैसे ऋतु जैन खुराना। आधुनिका ऋतु को याद है कि वह जैन परिवार की बेटी है, किंतु आजकल खुराना पति की जीवनसंगिनी है।
अहंकार को अलग पहचान चाहिए -- मेरी साड़ी सबसे अलग! मैं यूनिक हूँ। कोई मेरे समान्तर नहीं! परन्तु, जिसे मिलने का सुख चाहिए, उसे क्या फर्क पड़ता है कि वह गंगा से आई या यमुना से कि किसी बावड़ी से -- उसे बस यही याद है कि वह समुद्र हो गई है।
यह अस्मिता-बोध का प्रश्न है। जिसमें अस्मिता बोध बहुत प्रबल है, वह गंगाजल होने से इन्कार कर सकता है। मामला दिल का है। इसमें अच्छा-बुरा जैसा कुछ नहीं। बस अपनी सुविधा और खुशी है। इसलिए गंगा-जल और गंगाजल में विशेष अंतर नहीं है। भरपूर विश्वास है तो खाता एक रख लो। वरना, अलग-अलग खाता रखने की भी सुविधा है।
गंगा जल बोला -- मैं भी तो हूँ! तुम दोनों से अलग! जब तक चाहूँ, बिना किसी घोषणा या नाम दिए साथ निभाता हूँ। कोई आश्वासन नहीं, कोई बंधन नहीं, वादा नहीं, दिल से साथ रहता हूँ। न योजक का झंझट, न पास-पास बैठने की मजबूरी। जब तक जियो, खुशी से जियो!
गंगाजल वहीं से गरजा और दुत्कारा -- चल, बदचलन! महास्वार्थी! नाभारोसे! तेरा क्या साथ! और क्या विश्वास! तू दुनिया के सामने यह कहने तक को तैयार नहीं कि मैं तुम्हारा हूँ। -- न कोई संकेत, न वचन, न बंधन -- तू क्या पता, कोई अल्प -सा लोभ भी मिले, अल्प विराम भी मिले तो कहीं और चल दे ।
...देखो, देखो इसे! कल यह खड़ा था वाक्य के बाजार में। लिखा था -- गंगा जल और स्नान -- इन तीनों से मुझे डर लगता है।
मैं भौंचक रह गया। सोचता था -- ये दो हैं-- गंगाजल और स्नान। पता चला -- नहीं, नहीं! गंगा और जल स्वछंद मोड में आ गए हैं। ये बिना योजक वाले गंगाजल नहीं हैं, बल्कि इनका तलाक हुआ पड़ा है। ये विभूतियाँ अलग हो गई हैं। ब्रेक- अप से गुजर रही हैं।
--चल दुष्ट! तेरा भी कोई चरित्र है! स्वेच्छाचारी! कामी!!
गंगा जल फीकी पड़ गई मुस्कान-से बोला -- तुम मुझे लाख कोसो, फटकारो किंतु आजकल मेरा ही चलन है। लोगों को सुविधा मुझी- से होने लगी है।
मेरे साथ संकट यह है कि लोग मुझे किसी के भी साथ चलता देखते हैं तो उसका जीवनसाथी समझ बैठते हैं। भाई, जीवनसाथी क्यों, साथी क्यों नहीं? सहयात्री क्यों नहीं!
अब क्या कहूँ! सन 2026 का समाज है, तरह-तरह के लोग हैं। जेन जी भी हैं। जिसकी मर्जी, जैसे निबाहे। मैंने तो सभी चलन रख दिए हैं। कोई सुस्पष्ट मर्यादित है, कोई अभिन्न है तो कोई स्वच्छन्द! इसे बदचलनी कहो या स्वतंत्रता। अपनी - अपनी मान्यता है।
वैसे जीने के लिए स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, कुछ रेशमी बंधन भी उतने ही जरूरी हैं! कैसी जटिल है जिंदगी!!
डॉ. अशोक बत्रा
गुरुग्राम
