श्री देशना
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श्री देशना संग्रह

तुम सौंदर्य की निर्झरणी हो

19 जनवरी 2026

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नेह सिंधु अथाह मधुरिम,

पुलक हुलस भाव सरस ।

उमड़ घुमड़ लहर लहर,

रिमझिम रिमझिम बरस ।

स्नेहिल मोहक परिध क्षेत्र,

अपनत्व पथ विचरणी हो।।

तुम सौंदर्य की निर्झरणी हो ।।


प्रति पल व्याकुलता,

तरस तरस दृग वृष्टि।

तृषित तप्त उर पीर,

तपन हर हिय पुष्टि ।

धर मुस्कान आभा मंडल,

प्रणय उजास भरणी हो ।।

तुम सौंदर्य की निर्झरणी हो ।।


नीरस शुष्क दग्ध तन मन ,

दर्शन कर आनंद तृप्ति ।

शीतल सजल छाया कंग,

 अंतरतम आलोक युक्ति ।

प्रेरणा सेतु उत्सविक ज्योत,

उत्साह उमंग अवतरणी हो ।

तुम सौंदर्य की निर्झरणी हो  ।।


पुनीत दर्श परम सौभाग्य,

घट मंदिर सदैव पावन।

संवाद मृदु सरस सुधा ,

मानस खुशियां बिछावन 

हर पल ललित ललाम,

सदा प्रियतम संग परणी हो ।

तुम सौंदर्य की निर्झरणी हो ।।


कुमार महेन्द्र


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