श्री देशना संग्रह
वन्देमातरम पर भी मातम
29 जनवरी 2026
पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वर्तमान में देश की राजनीति की डगर संसद के हर सत्र में थोड़ी और पतन की ओर आगे बढ़ गई है, बस गनीमत यही है कि देश के विकास में यह कोई कारगर अड़चन खड़ी करने में विफल रहती है। इसलिये मैं 2025 के शीतकालीन सत्र के एक मुद्दे से अपनी बात शुरू करना चाहूँगा-
8 दिसंबर को जब संसद सत्र शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अपने राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम पर चर्चा शुरू की- ‘‘हमें अपने राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने पर इसे एक उत्सव का रूप देना चाहिए।’’ स्पीकर महोदय ने चर्चा करने की इजाजत तो दे दी लेकिन चर्चा शुरू होते ही विपक्ष ने विरोध का कहर ढा दिया।
यह कहना तो गलत हो जाएगा कि विपक्ष के माननीय जो इसका विरोध कर रहे थे, जिन्हें इसकी पंक्तियों और शब्दों का अर्थ नहीं मालूम था लेकिन क्योंकि यह मुद्दा सत्ता पक्ष की ओर से उठाया गया था तो इसके स्वर में स्वर मिलाने से तो उनकी राजनीति ही समाप्त हो जाती, उनका वोट बैंक आधा नहीं पूरा ही खिसक जाता। तो इसी कारण से विपक्ष द्वारा अनेक तरह के नारे संसद में गूँजने लगे- ‘‘हम मर जाएँगे लेकिन वंदेमातरम वाला गीत नहीं गाएँगे, इसमें तो तमाम देवियों की वंदना भरी पड़ी है, यह सीधे-सीधे हमारे धर्म के विरुद्ध है।’’
चलिए इस बात को यहीं छोड़कर जरा इस गीत में झाँक कर देखें-
भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी (ब्रिटिश कम्पनी) के माध्यम से अंग्रेजों के लगभग 100 साल पूरे हो चुके थे। 1857 में अंग्रेजों की सेना में श्री मंगल पांडे के नेतृत्व में एक बड़ा विद्रोह हुआ, जिसमें बहुत सारे सैनिक मारे गए और विद्रोह बुरी तरह विफल हुआ। लेकिन इस विद्रोह ने भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति एक ऐसी चेतना को जन्म दे दिया जो भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिये बहुत आवश्यक थी। इस अधूरी क्रांति के ठीक 18 साल बाद 1875 में श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जो एक कट्टर राष्ट्रवादी थे और साथ ही वे गीतकार, फिल्मकार भी थे। उन्होंने वंदेमातरम नाम के इस अमर राष्ट्रीय गीत की रचना की, जो देखते ही देखते अंग्रेजों कि विरुद्ध लड़ रहे हर क्रांतिकारी का गीत बन गया। उस समय देश में कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी। देश में लगातार बढ़ रहे अंग्रेजों के प्रति आक्रोश से 1885 में कांग्रेस पार्टी का जन्म हुआ और इस गीत को सबसे पहले 1896 में रविंद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। उन्हीं दिनों इस गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया था। बाद में 24 जनवरी 1950 को इसे संविधान सभा ने राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकृति दी।
न जाने भारत माँ के कितने वीर सपूत वंदेमातरम गाते-गाते फाँसी के फंदे पर झूल गए थे। आजादी की यह लड़ाई जो लगभग सौ साल तक लड़ी गई इसमें न कोई धर्म आड़े आया न जाति। ऐसे पुनीत गीत के 150 साल पूरे होने पर 8 दिसंबर 2025 को भारत की संसद में इस पर चर्चा करनी चाही तो ऐसा लगा जैसे किसी ने ततैयों के छत्ते में हाथ डाल दिया हो।
बड़ी अजीब बात है कि कांग्रेस राज के समय में इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकारा गया और कांग्रेस ही इसका सबसे अधिक विरोध कर रही है। संसद में सारा विपक्ष विशेषकर कांग्रेस के माननीय बल्कि यह कहिए की इंडी के सारे माननीय इस मुद्दे पर एकजुट होकर मोदी के विरोध में खड़े हो गए। जैसे-तैसे इस गीत पर चर्चा शुरू हुई जो 11 घंटे और 32 मिनट तक चली। जिस पर जनता का लगभग 17 करोड़ और 30 लाख रुपया खर्च आया। एक अनुमान के अनुसार संसद सत्र में हर मिनट की कार्यवाही पर लगभग ढाई लाख रुपए का खर्च आता है।
एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि श्री मोदी के स्थान पर कोई कांग्रेस का प्रधानमंत्री होता तो क्या इस मुद्दे पर फिर भी 11 घंटे और 32 मिनट खर्च होते? कदापि नहीं। लेकिन यहाँ हमारी खुद की बेवकूफी ही एक सवालिया निशान बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती है क्योंकि अब तो ऐसी बात देश का कोई बुद्धिजीवी सोचता ही नहीं है।
चलिए हम तो यह कहना चाहते हैं कि विपक्षी माननीय विरोध तो अवश्य करें लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध न करें क्योंकि आज देश की जनता वह नहीं रही जो दो-ढाई दशक पहले थी। उस समय कोई नेता, किसी भी पार्टी का, कैसा भी आश्वासन अपने चुनाव के समय दे देता था तो जनता उसे सच मान लेती थी। पर पता नहीं कैसे यह इतनी समझदार हो गई है कि झूठ और सच में अंतर करने लगी है और अपने वोट की कीमत समझने लगी है। हम तो अपने देश के कर्णधारों से यही प्रार्थना करेंगे कि आप अपनी लड़ाई जारी रखें (नेता बनने की) क्योंकि हम जानते हैं कि देश में ऐसे बहुत से नेता हैं जो अगर जनता का सेवक बनने से वंचित हो जाते हैं तो ऐसा महसूस करते हैं कि वे जीवित तो हैं पर उनकी आत्मा उनसे विदाई लेकर कहीं चली गई है। यह कैसी रचना है उस करतार की कि बिना जनता की सेवा किए उस नेता को नींद ही नहीं आती।
-बी.एल. गौड़
blgaur36@gmail.com
