श्री देशना संग्रह
टोटा है भाषिक तमीज का....
26 मई 2023
टोटा है भाषिक तमीज का....
तथा कथित पढ़े लिखे सभ्य समाज की श्रेणी में प्रथमत रखे जाने वाले वर्ग से सबकी आशा यही होती है कि वह समाजिक शिष्टाचार का पालन करेगा, बातचीत में संयत रहेगा और भाषिक तमीज को प्राथमिकता पर रखेगा। यह अपेक्षा इस वर्ग से इसलिए और बढ़ जाती है कि प्राथमिक स्तर से ही उन्हें बार बार ये सिखाया पढ़ाया जाता है कि ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय या बानी एक अमोल है जो कोई बोले जानि, हिय तराजू तौल के तब मुख बाहर आनि या जिव्हा ऐसी बाबरी कह गई स्वर्ग पताल, आप तो अन्दर गई जूती खाय कपाल या शब्द संभाल के बोलिए शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द दवा बने एक शब्द करे घाव। और भी न जाने कितना कितना पढ़ाया लिखाया सिखाया जाता है कि जब कोई बड़ा बात कर रहा हो तो उसे ध्यान से सुनें, उसकी बात बीच में न काटे, बहुत आवश्यक हो तो अनुमति लेकर शिष्ट भाषा में ही अपनी बात रखें। असहमति और विरोध भी दर्ज कराना हो तो उसे भी शिष्टता के साथ तमीज के साथ रखा जाए सकता है।
बहुत उग्र होकर, आवेश में आकर, अशिष्टता के साथ असभ्यता दर्शाते तो बात का वजन वैसे ही कम हो जाता है। सामने वाला एक बार को मूर्खता कर भी रहा है तो उसी भाव से प्रतिक्रिया देते क्रोध में कुछ भी कहना निश्चित ही अग्नि में घी डालना है। इससे बात बनती नहीं, बल्कि और बिगड़ जाती है। क्रोध में शब्द वैसे ही साथ छोड़ देते हैं, चेहरा विकृत हो जाता है, कहना कुछ चाहते हैं निकलता कुछ है। ये भी निखालिस सच है कि झूठ पर क्रोध आना स्वाभाविक है, छोटों के उत्पात पर गर्म होना सहज है पर आवेश में आकर तो व्यक्ति अपना ही नुकसान अधिक करता है। फिर रहीम याद आते हैं क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात, का रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात। अब हरि विष्णु जैसे सहनशील होना न भी आता हो कि कोई सीने पर लाट मारे और हम उससे पूछे कि मेरा वक्षस्थल बहुट कठोर है , कहीं तुम्हारे चोट तो नहीं लग गई।
पर हम अपना विरोध या असहमति दर्ज कराने के और भी बहुत से तरीक़े हैं।
उद्देश्य किसे को नीचा दिखाना नहीं हुआ करता, बल्कि उसे उसकी गलती का बोध कराना होता है। बस हम यहीं चूक जाते हैं और गरमा गरमी में कभी भी सार्थक परिणाम नहीं निकला करते। भाषा की इस तमीज का ह्रास संसद के बड़े पटलो से लेकर शिक्षा संस्थाओं में लगातार दिख रहा है। जिन अध्यापकों के कंधों पर देश के भविष्य के निर्माण का दायित्व है उनके व्यवहार में ही यदि भाषिक स्खलन है तो सामान्य वर्ग से भला क्या अपेक्षा की जा सकती है। शिक्षक बिरादरी तो सबको पाठ पढ़ाती है , सबको शिष्टाचार और अनुशासन में रहने को प्रेरित और संबोधित करती है फिर भला उन्हें समझाने कौन आयेगा। शिष्ट समुदाय के वार्तालाप की तमीज उन्हें कौन बताएगा, समझाएगा। उन्हें तो लाखो करोड़ों का आदर्श बनना है। विद्यार्थी के वे रोल मॉडल हैं। यदि उनके विचार व्यवहार में ही संतुलन नहीं तो ये देश कैसे आगे बढ़ेगा, उन्नति के पथ पर अग्रसर होगा।
तो मित्रो, बंधुओं, भगिनियो, सबसे अपील है कि भाषा की तमीज का टोटा न होने दें। ये बची रही तो बहुत कुछ बच जायेगा। तो बोलने से पहले तोल लें , तोल मोल के बोल के सिद्धांत को अंगीकृत कर लें। छोटी सी पहल हम सबके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है।
