श्री देशना संग्रह
मेरी मजबूर सी यादें
12 सितंबर 2021
भुला नहीं पाए हम उसको, मेरी वो मजबूर सी यादें
याद बहुत आती है हमको, बहुत सारी उसकी बातें
लाख हमने कोशिश की , सब कुछ वो भुलाने की
बहुत बुरा सपना था वो तो , दिल को समझाने की
ना समझा कभी हमने , दिल बड़ा नादाँ होता है
इससे खेलना किसी का, कितना आसां होता है
सपनो का महल था मेरा, उसने कैसे तोड़ दिया
वादे सारे भूल गया वो , बेवस हमको छोड़ दिया
बहुत बुरा जालिम था वो ,बहुत सितमगार था
जुल्म उसने बहुत ढाये , ना कोई मददगार था
लालची था बहुत बड़ा वो, दौलत का पुजारी था
वासना का कीड़ा था वो , वो तो एक शिकारी था
माँ-बाप के दिल को तोड़ा ,बहुत हमें समझाया था
बहुरूपिये है कितने यहाँ ,सब कुछ तो बताया था
देखा नहीं उन अश्रु धार को , खुद हमें भरोसा था
तड़फते छोड़ा था हमने , कितना उनको कोसा था
लहू के आँसू पी रहे थे ,उसे कहाँ अहसास था
कितने हम मजबूर हैं , बस उसका अट्ठास था
अपनों का भी साथ नहीं, कैसा ये परिहास था
हर तरफ बर्बादी दिखती , मन बहुत उदास था
खुद को फिर संभाला हमने, काट दिया हमने वो बंधन
जीवन नहीं है हार मानना , अपने उर में बसता चंदन
चल पड़े हैं हम तो अकेले , अपनी डगर बसाने को
मज़बूरी हैं वो सब यादें , लगे जिन्हें हम भुलाने को
श्याम मठपाल, उदयपुर
